फर्रुखाबाद।
एनएकेपी डिग्री कॉलेज के सामने गुरुवार को उस समय मानवता की मिसाल देखने को मिली, जब तीन दिवसीय निशुल्क दिव्यांग सहायता शिविर में सुबह से ही जरूरतमंदों की भीड़ उमड़ पड़ी। कोई कृत्रिम पैर की उम्मीद लेकर पहुंचा तो कोई बैसाखी और व्हीलचेयर की जरूरत के साथ शिविर में आया। जयपुर से पहुंचे विशेषज्ञों की टीम ने दिव्यांगों की जांच कर उनकी जरूरत के मुताबिक निशुल्क कृत्रिम उपकरण उपलब्ध कराने की प्रक्रिया पूरी की।
शिविर के तीसरे दिन सुबह करीब आठ बजे से ही दिव्यांगों और उनके परिजनों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। कार्यक्रम का शुभारंभ फीता काटकर किया गया। एसएन साध ट्रस्ट एवं स्व. डॉ. रजनी सरीन की प्रेरणा से आयोजित इस शिविर का उद्देश्य जरूरतमंद दिव्यांगों को उनकी आवश्यकता के अनुसार उपयोगी उपकरण उपलब्ध कराकर उनके जीवन को आसान बनाना है।
रजिस्ट्रेशन के बाद विशेषज्ञों की जांच, फिर जरूरत के मुताबिक उपकरण
शिविर में पहुंचने वाले दिव्यांगों का पहले रजिस्ट्रेशन किया गया। इसके बाद जयपुर से आए विशेषज्ञों ने उनकी जांच की। शारीरिक स्थिति और जरूरत का आकलन करने के बाद संबंधित दिव्यांग के लिए उपयुक्त उपकरण तय किया गया। इसके बाद जरूरत के अनुसार निशुल्क कृत्रिम उपकरण उपलब्ध कराए गए।
किसी को कृत्रिम पैर तो किसी को मिला कृत्रिम हाथ
शिविर में दिव्यांगों के लिए कृत्रिम पैर, कृत्रिम हाथ, पोलियो प्रभावित लोगों के लिए कैलीपर, बैसाखी और व्हीलचेयर सहित विभिन्न प्रकार के उपकरण उपलब्ध कराए गए। कटे हुए हाथ वाले लोगों को कृत्रिम हाथ की सुविधा दी गई, जबकि चलने में परेशानी झेल रहे लोगों को उनकी जरूरत के अनुसार सहायक उपकरण दिए गए।
फर्रुखाबाद के साथ छह जिलों से भी पहुंचे जरूरतमंद
निशुल्क सहायता की खबर आसपास के जिलों तक पहुंची तो बड़ी संख्या में लोग फर्रुखाबाद पहुंचे। हरदोई, शाहजहांपुर, अलीगढ़, एटा, मैनपुरी और कन्नौज समेत कई जिलों से आए दिव्यांगों की जांच की गई। दूर-दराज से आए लोगों को शिविर में किसी तरह की परेशानी न हो, इसके लिए भोजन की व्यवस्था भी की गई।
सेवा में जुटे रहे कार्यकर्ता
शिविर की व्यवस्थाओं को सुचारु रखने में राकेश साध, चमकेश साध, अमर साध, उदयपाल, रोहित और छोटू समेत कई लोगों ने सहयोग किया। शिविर में पहुंचे लोगों ने निशुल्क जांच और उपकरण मिलने पर राहत जताई।
तीन दिवसीय शिविर में उमड़ी भीड़ ने यह साफ कर दिया कि जब जरूरतमंदों तक सहायता सीधे पहुंचती है तो उसका असर जमीन पर साफ दिखाई देता है। कृत्रिम अंग और सहायक उपकरण पाने वाले दिव्यांगों के लिए यह शिविर सिर्फ मदद का माध्यम नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी को थोड़ा और आसान बनाने की एक बड़ी पहल साबित हुआ।

