योगी भोगी हो गए, संत चले बाजार।
अबलाएँ मठ-लोक से, रह-रह करें पुकार॥
माटी की मर्याद भी, हुई आज बेहाल,
धर्म-ध्वजा के नाम पर, बिछते छल के जाल।
भक्ति बनी प्रदर्शन अब, मन होता बीमार—
योगी भोगी हो गए, संत चले बाजार॥
गेरुए चोले ओढ़कर, करते लोभ-विहार,
माया के इस खेल में, डूबा हर दरबार।
साधुता की आड़ में, चलता है व्यापार—
योगी भोगी हो गए, संत चले बाजार॥
अब आस्था की आड़ में, होता है अपमान,
अबलाओं की वेदना, सुनता नहीं इंसान।
मठ-मंदिर भी बन गए, पीड़ा के द्वार—
योगी भोगी हो गए, संत चले बाजार॥
जागो आज समाज तुम, पहचानो यह चाल,
सच्चे संतों से अलग, ये नकली जंजाल।
राह सत्य की पकड़ो, छोड़ो झूठा जाल—
योगी भोगी हो गए, संत चले बाजार॥
– डॉ. प्रियंका सौरभ
