विभाजन, राजनीति और 20 जून : क्या श्यामा प्रसाद मुखर्जी पश्चिम बंगाल के संस्थापक हैं?
*(आलेख : शमिक लाहिड़ी, अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते)*
हाल के वर्षों में, 20 जून को ‘पश्चिम बंगाल दिवस’ के तौर पर स्थापित करने और श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पश्चिम बंगाल का संस्थापक बताने की एक सुनियोजित राजनीतिक कोशिश की गई है। इतिहास का राजनीतिक इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है, लेकिन किसी भी ऐतिहासिक घटना को उसके पूरे संदर्भ में समझा जाना चाहिए। इसलिए, 20 जून से जुड़ी इस धारणा की सच्चाई की जांच करना ज़रूरी है।
बंगाल को बांटने की राजनीति 1947 में शुरू नहीं हुई थी। औपनिवेशिक शासन के दौरान, अंग्रेजों ने बार-बार बंगाल की राजनीतिक और सांस्कृतिक ताकत को कमजोर करने की कोशिश की। 1905 में बंगाल का विभाजन इसका एक बड़ा उदाहरण था। हालांकि इसे प्रशासनिक कदम के तौर पर पेश किया गया था, लेकिन इसका असली मकसद बंगाली राष्ट्रवाद को कमजोर करना और हिंदुओं और मुसलमानों के बीच फूट डालना था। बंगाल के लोगों ने ‘स्वदेशी आंदोलन’, ‘रक्षाबंधन’, सांस्कृतिक विरोध और आर्थिक बहिष्कार के ज़रिए इसका विरोध किया।
इस आंदोलन के पीछे मुख्य प्रेरणा देने वालों में से एक रवींद्रनाथ टैगोर थे। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि बंगाली पहचान धर्म के बजाय भाषा, संस्कृति और साझा सामाजिक जीवन पर आधारित थी। उनके आह्वान पर, ‘रक्षाबंधन’ सांप्रदायिक विभाजन के ख़िलाफ़ एकता का प्रतीक बन गया। ‘बंग्लार माटी बंग्लार जल…’ और ‘आमार सोनार बांग्ला…’ जैसे गीतों के ज़रिए उन्होंने बंगाल की सांस्कृतिक एकता के विचार को मज़बूत किया। आख़िरकार, ब्रिटिश सरकार को विभाजन रद्द करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
फिर भी, विभाजन की राजनीति जारी रही। 1930 और 1940 के दशकों में सांप्रदायिक राजनीति और मज़बूत हुई। मुस्लिम लीग के ‘दो-राष्ट्र सिद्धांत’ और हिंदुत्व की राजनीतिक सोच, दोनों ने ही धर्म को राजनीतिक पहचान का आधार बनाने की कोशिश की। फलस्वरूप, साझा भाषा और संस्कृति पर आधारित व्यापक ‘बंगाली’ पहचान पर दबाव बढ़ता गया।
जब भारत से अंग्रेजों की वापसी अवश्यंभावी हो गई, तो विभाजन का मुद्दा सबसे अहम हो गया। 20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने घोषणा की कि सत्ता भारतीयों को सौंप दी जाएगी। इसके बाद लॉर्ड माउंटबेटन ने समय-सीमा को आगे बढ़ाया और 3 जून 1947 को अपनी योजना की घोषणा की। उस योजना ने असल में भारत और बंगाल, दोनों के विभाजन को तय कर दिया। इसलिए, 20 जून को बंगाल विधानसभा के सत्र का आयोजन पहले से लिए गए फैसले को औपचारिक रूप से लागू करने का एक हिस्सा था। यह वह समय नहीं था, जब बंगाल के विभाजन की योजना बनी थी।
यह वह मुख्य ऐतिहासिक तथ्य है, जो अक्सर आज के राजनीतिक अभियानों में छिपा दिया जाता है। बंगाल के विभाजन का फ़ैसला 20 जून से पहले ही हो चुका था। विधानसभा ने तो बस उस रूपरेखा पर वोट दिया था, जो पहले ही तय की जा चुकी थी।
यह भी याद रखना ज़रूरी है कि कई प्रमुख बंगाली नेताओं ने विभाजन का विरोध किया था। शरत चंद्र बोस, अबुल हाशिम और अन्य नेताओं ने एक एकजुट बंगाल की वकालत की थी। उनका मानना था कि धार्मिक आधार पर विभाजन से आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से बंगाल कमज़ोर हो जाएगा और साथ ही वहाँ के लोगों की साझा पहचान भी कमज़ोर होगी।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भी लंबे समय तक एक एकजुट भारत के भीतर एक अखंड बंगाल के विचार का समर्थन किया था। कम्युनिस्ट नेताओं का तर्क था कि साम्राज्यवादी हितों के कारण ही बंटवारे की बात की जा रही थी, क्योंकि इससे बंगाल राजनीतिक रूप से कमजोर हो जाता। बहरहाल, जून 1947 तक राजनीतिक हालात बहुत खराब हो गए थे। मुस्लिम लीग चाहती थी कि पूरा बंगाल पाकिस्तान का हिस्सा बन जाए, जबकि हिंदू सांप्रदायिक ताकतें विभाजन के लिए सक्रिय रूप से अभियान चला रही थीं। ऐसे हालात में, कम्युनिस्टों का तर्क था कि किसी भी आबादी को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी राज्य के ढांचे में शामिल होने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। नतीजन, कम्युनिस्ट विधायकों ने बंगाल के विभाजन के पक्ष में वोट दिया, जबकि साथ ही वे भारत के विभाजन का पूरी तरह से विरोध भी कर रहे थे।
आज प्रायः 20 जून के मतदान को ऐसे दिखाया जाता है, जैसे कि यह लोगों की सीधी इच्छा को ज़ाहिर करती हो। असल में, यह कोई जनमत संग्रह नहीं था। अविभाजित बंगाल के लगभग 5.5 करोड़ लोगों का भविष्य सिर्फ़ 250 विधायकों ने तय किया था, जिन्हें मतदान के बहुत सीमित अधिकार वाली व्यवस्था के तहत चुना गया था। बंगाल का विभाजन होना चाहिए या नहीं, इस बारे में आम बंगालियों से कभी सीधे तौर पर राय नहीं ली गई। इसलिए, बंगाल के बंटवारे को सही मायनों में जनता का लोकतांत्रिक जनादेश नहीं कहा जा सकता।
19 जून 1947 को कम्युनिस्ट विधायकों ज्योति बसु, रतन लाल ब्राह्मण और रूपनारायण रॉय ने एक संयुक्त बयान जारी किया, जिसमें कम्युनिस्टों का रुख़ साफ़ तौर पर ज़ाहिर हुआ। यह बयान कम्युनिस्ट दैनिक ‘स्वाधीनता’ में छपा था। बयान में कहा गया था कि माउंटबेटन योजना ने एक संप्रभु और एकजुट बंगाल की संभावना को असल में खत्म कर दिया है। साथ ही, इसमें ऐसी किसी भी कार्रवाई के ख़िलाफ़ चेतावनी दी गई थी, जिससे हिंदू-मुसलमानों के रिश्ते और ज़्यादा खराब हो सकते थे। इस बयान में यह भी कहा गया था कि पश्चिमी बंगाल के ग़ैर-मुस्लिम बहुल इलाक़ों की इच्छा के ख़िलाफ़ पूरे बंगाल को पाकिस्तान में मिलाना ज़बरदस्ती होगी। फलस्वरूप, कम्युनिस्ट विधायकों ने घोषणा की कि वे विभाजन के पक्ष में वोट देंगे, ताकि किसी भी अनिच्छुक आबादी को उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ किसी राजनीतिक व्यवस्था में शामिल होने के लिए मजबूर न किया जाए।
इस तरह, कम्युनिस्ट विधायकों ने बंटवारे का समर्थन किसी आदर्श समाधान के तौर पर नहीं किया था, बल्कि पहले से मौजूद राजनीतिक सच्चाई के जवाब में किया था। जैसा कि बाद में ज्योति बसु ने कहा, पार्टी भारत के विभाजन के खिलाफ थी, लेकिन उसे रोकने के लिए ज़रूरी ताकत उसमें नहीं थी। यह ऐतिहासिक संदर्भ तब अहम हो जाता है, जब हम श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पश्चिम बंगाल का एकमात्र निर्माता या संस्थापक बताने की आज की कोशिशों को देखते हैं। ऐतिहासिक सबूत ऐसे दावे का समर्थन नहीं करते। 20 जून को विधानसभा में हुए मतदान में, बंगाल के पश्चिमी हिस्से के 58 विधायकों ने विभाजन के पक्ष में वोट दिया था। इनमें से ज़्यादातर कांग्रेस के सदस्य थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक बहुत बड़ी राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल सिर्फ़ एक व्यक्ति थे। इसलिए, पश्चिम बंगाल के गठन को किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि के तौर पर पेश करना ऐतिहासिक रूप से गलत है।
ब्रिटिश शासन के दौरान उनकी राजनीतिक भूमिका भी विवादित रही है। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के समय, मुखर्जी बंगाल सरकार में वित्त मंत्री थे। 26 जुलाई 1942 को तत्कालीन गवर्नर जॉन हर्बर्ट को लिखे एक पत्र में उन्होंने तर्क दिया था — “युद्ध के दौरान, यदि कोई भी ऐसी जन-भावना भड़काने की योजना बनाता है जिससे आंतरिक अशांति या असुरक्षा पैदा हो, तो किसी भी सरकार को उसका विरोध करना चाहिए। …सवाल यह है कि बंगाल में इस आंदोलन का मुकाबला कैसे किया जाए? राज्य का प्रशासन इस तरह से चलाया जाना चाहिए कि … यह आंदोलन राज्य में जड़ें जमा न पाए।”
ये बातें स्वतः स्पष्ट हैं और भारत की आज़ादी के आंदोलन में उनके विश्वासघात को उजागर करता है।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस भी सांप्रदायिक राजनीति के कड़े आलोचक थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपनी डायरी ‘लीव्स फ्रॉम ए डायरी’ में खुद लिखा था — “सुभाष ने एक बार दोस्ताना अंदाज़ में मुझे चेतावनी दी थी और खास तौर पर यह कहा था कि अगर हमने बंगाल में कोई विरोधी राजनीतिक संगठन बनाने की कोशिश की, तो वे यह पक्का करेंगे (ज़रूरत पड़ने पर ज़बरदस्ती भी) कि वह संगठन बनने से पहले ही टूट जाए। मुझे उनका यह रवैया बहुत अनुचित और बेतुका लगा।” चाहे कोई बोस की भाषा से सहमत हो या न हो, यह घटना सांप्रदायिक राजनीतिक लामबंदी के प्रति उनके विरोध की गहराई को दिखाती है।
इसलिए यह विडंबनापूर्ण है कि ऐसे संगठन, जिनके वैचारिक पूर्वज अक्सर उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन के साथ विरोध का संबंध बनाए रखते थे, भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कम्युनिस्टों के योगदान पर सवाल उठाना चाहते हैं। बंगाल की जेलों, हिरासत शिविरों और अंडमान की सेलुलर जेल का इतिहास कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं और भावी कम्युनिस्ट नेताओं द्वारा किए गए बलिदानों का प्रमाण बताता है।
भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के संस्थापकों में से एक, मुज़फ़्फ़र अहमद और अब्दुल हलीम ने औपनिवेशिक शोषण के ख़िलाफ़ मज़दूरों, किसानों और छात्रों को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई थी। ट्रेड यूनियन, किसान संगठन और साम्राज्यवाद-विरोधी आंदोलन के निर्माण की उनकी कोशिशों ने बंगाल में एक मज़बूत लोकतांत्रिक लहर पैदा करने में मदद की।
आज़ादी की लड़ाई में शामिल कई क्रांतिकारी बाद में कम्युनिस्ट आंदोलन में शामिल हो गए। गणेश घोष, कल्पना दत्त (जोशी), सुबोध रॉय, हरे कृष्ण कोनार और सतीश पक्राशी जैसे कई लोगों ने ब्रिटिश जेलों — जिनमें सेलुलर जेल भी शामिल थी — में कई साल बिताए। जेल में रहने के दौरान, उनमें से कई लोग मार्क्सवादी विचारों के संपर्क में आए और बाद में कम्युनिस्ट राजनीति में सक्रिय हो गए। उनके ज़रिए, उपनिवेश-विरोधी संघर्ष की क्रांतिकारी परंपरा और वामपंथ के मज़दूर-किसान आंदोलनों के बीच एक ऐतिहासिक कड़ी बनी।
इस परंपरा ने ट्रेड यूनियन आंदोलनों, किसान संगठनों, सांप्रदायिकता-विरोधी अभियानों और 1946-47 के ऐतिहासिक तेभागा आंदोलन के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ये घटनाक्रम बंगाल के राजनीतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय हैं।
एक और आम दावा यह है कि कोलकाता केवल श्यामा प्रसाद मुखर्जी के कारण पश्चिम बंगाल का हिस्सा बना। ऐतिहासिक अभिलेख एक अलग ही कहानी बताते हैं। कांग्रेस, हिंदू महासभा और कई अन्य संगठन सभी पश्चिम बंगाल की व्यवहार्यता के लिए कोलकाता को अपरिहार्य मानते थे। लगभग हर प्रमुख राजनीतिक समूह द्वारा, बंगाल के प्रमुख बंदरगाह, औद्योगिक केंद्र और प्रशासनिक राजधानी के रूप में इसका समावेश आवश्यक माना जाता था। नतीजन, किसी एक व्यक्ति को विशेष श्रेय देना, ऐतिहासिक तथ्यों की ज़बरदस्त तोड़-मरोड़ के अलावा और कुछ नहीं है।
इसके बाद एक और सवाल उठता है — क्या 20 जून को सचमुच पश्चिम बंगाल का स्थापना दिवस माना जा सकता है? ऐतिहासिक रूप से इसका जवाब है — ‘नहीं’। 15 अगस्त 1947 को पश्चिम बंगाल की सीमाएँ वैसी नहीं थीं, जैसी कि आज राज्य की सीमा हैं। कूच बिहार 1950 में पश्चिम बंगाल में शामिल हुआ, पुरुलिया को 1956 में जोड़ा गया, और 2015 में भारत-बांग्लादेश एन्क्लेव (क्षेत्र) के आदान-प्रदान के ज़रिए इलाकों में और बदलाव हुए। यह आधुनिक राज्य कई ऐतिहासिक प्रक्रियाओं से गुज़रकर बना है, जो जून 1947 से कहीं आगे तक फैली हुई हैं।
सबसे अहम बात यह है कि बंगाल के बंटवारे की भारी मानवीय कीमत चुकानी पड़ी है। करोड़ों लोग विस्थापित हुए और शरणार्थी बन गए। परिवार बिछड़ गए। खेती, उद्योग, व्यापार नेटवर्क और सामाजिक रिश्तों पर बहुत बुरा असर पड़ा। बंगाल ने अपनी प्राकृतिक आर्थिक एकता का बड़ा हिस्सा खो दिया, और उस बंटवारे के नतीजे आज भी इस इलाके पर असर डाल रहे हैं।
इसीलिए, बंगाल के बंटवारे को सिर्फ़ एक जीत के तौर पर नहीं मनाया जा सकता। यह एक दुखद और जटिल ऐतिहासिक घटना बनी हुई है। यह हमें याद दिलाता है कि धार्मिक आधार पर बंटवारा सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं को हल नहीं करता ; बल्कि अक्सर नई समस्याएं पैदा करता है।
बंगाल की ताकत कभी भी बंटवारे पर टिकी नहीं रही है। इसकी असली ताकत इसकी भाषा, संस्कृति, मानवतावाद, तर्कवाद और अनेकतावादी परंपराओं में निहित है। रवींद्रनाथ टैगोर, काज़ी नज़रुल इस्लाम, जीवनानंद दास, सुकांत भट्टाचार्य, सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक और अमर्त्य सेन की विरासतें इसी व्यापक सांस्कृतिक धरोहर से उपजी हैं। यहाँ तक कि पूर्वी बंगाल ने भी अंततः भाषा के मुद्दे पर पाकिस्तान के खिलाफ़ विद्रोह किया, जिससे एक बार फिर यह साबित हुआ कि अक्सर भाषाई और सांस्कृतिक बंधन धार्मिक पहचान से कहीं अधिक मज़बूत होते हैं। 1952 के भाषा आंदोलन और 1971 के मुक्ति संग्राम ने इस सच्चाई को फिर से पुष्ट किया।
इसलिए, समकालीन राजनीतिक लामबंदी के लिए 20 जून को हथियार में बदलने के बजाय, बंगाल के विभाजन के इतिहास को उसकी पूरी जटिलता के साथ समझना ज़्यादा ज़रूरी है। इतिहास का मकसद मनगढ़ंत कहानियाँ बनाना नहीं, बल्कि सच को सामने लाना है। और सच यह है कि बंगाल का विभाजन एक ऐसी त्रासदी थी, जिससे मिले सबक आज भी हमसे सोच-विचार, सतर्कता और ऐतिहासिक ईमानदारी की माँग करते हैं।
*(लेखक पूर्व सांसद, माकपा के केंद्रीय समिति सदस्य और ‘गणशक्ति’ के संपादक हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं।
