न्यूनतम मजदूरी का अधिकार अब सभी क्षेत्रों के कर्मचारियों को, मजदूरी संहिता-2019 ने बढ़ाया वैधानिक संरक्षण का दायरा
– *लेखक: मुकेश कुमार तिवारी*, क्षेत्रीय श्रम आयुक्त, कानपुर
किसी भी कर्मचारी के लिए उचित मजदूरी केवल उसकी आर्थिक आवश्यकता का विषय नहीं है, बल्कि यह सम्मानजनक जीवन, सामाजिक सुरक्षा और श्रम की गरिमा से भी जुड़ी हुई है। प्रत्येक कर्मचारी को उसके श्रम के बदले उचित पारिश्रमिक मिले, यह सुनिश्चित करना एक न्यायपूर्ण श्रम व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इसी उद्देश्य से मजदूरी संहिता, 2019 में न्यूनतम मजदूरी के अधिकार को व्यापक बनाने की व्यवस्था की गई है। इसके तहत न्यूनतम मजदूरी का वैधानिक संरक्षण अब केवल पहले से अधिसूचित अनुसूचित रोजगारों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि संहिता में निर्धारित पात्रता के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत कर्मचारियों को भी इसका लाभ मिल सकता है।
पहले न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के अंतर्गत न्यूनतम मजदूरी का संरक्षण मुख्य रूप से अनुसूचित रोजगारों (Scheduled Employments) पर आधारित था। इसके तहत केंद्र और राज्य सरकारें निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार विभिन्न रोजगारों को अनुसूचित करती थीं और उनके लिए न्यूनतम मजदूरी की दरें अधिसूचित करती थीं। इस व्यवस्था की एक सीमा यह थी कि रोजगार के नए स्वरूप विकसित होने के बावजूद अनुसूचित रोजगारों की सूची में बदलाव की प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी हो सकती थी। परिणामस्वरूप, कुछ नए सेवा और कार्यालय आधारित कार्यक्षेत्रों में कार्यरत कर्मचारियों को न्यूनतम मजदूरी के संरक्षण को लेकर कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता था।
मजदूरी संहिता, 2019 की धारा 5 इस व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव करती है। इसके अनुसार कोई भी नियोक्ता किसी कर्मचारी को संबंधित उपयुक्त सरकार द्वारा अधिसूचित न्यूनतम मजदूरी की दर से कम भुगतान नहीं कर सकता। इस प्रावधान का उद्देश्य न्यूनतम मजदूरी के अधिकार को व्यापक बनाना है, ताकि कर्मचारी को केवल इस आधार पर संरक्षण से वंचित न किया जाए कि उसका रोजगार किसी पारंपरिक औद्योगिक क्षेत्र से संबंधित नहीं है।
इस बदलाव का विशेष महत्व सेवा क्षेत्र और आधुनिक कार्यालयों में कार्यरत कर्मचारियों के लिए है। डेटा एंट्री ऑपरेटर, कंप्यूटर ऑपरेटर, कार्यालय सहायक, रिकॉर्ड प्रबंधन कर्मचारी और डाटा प्रोसेसिंग का कार्य करने वाले व्यक्ति भी न्यूनतम मजदूरी के संरक्षण के दायरे में आ सकते हैं, बशर्ते वे संहिता में दी गई कर्मचारी की परिभाषा के अंतर्गत आते हों और संबंधित वैधानिक शर्तें पूरी करते हों। किसी कर्मचारी के अधिकार का निर्धारण केवल उसके पदनाम से नहीं, बल्कि उसके वास्तविक कार्य, वैधानिक स्थिति और लागू न्यूनतम मजदूरी अधिसूचना के आधार पर किया जाएगा।
यहां कर्मचारी (Employee) और श्रमिक (Worker) की परिभाषा के बीच अंतर समझना भी आवश्यक है। मजदूरी संहिता की धारा 2 में दोनों के लिए अलग-अलग परिभाषाएं दी गई हैं। कर्मचारी की परिभाषा में कुशल, अर्धकुशल, अकुशल, तकनीकी, परिचालन, लिपिकीय, पर्यवेक्षकीय, प्रबंधकीय और प्रशासनिक कार्य करने वाले व्यक्ति भी शामिल हो सकते हैं। वहीं श्रमिक की परिभाषा का दायरा अलग है और इसमें कुछ कार्यों तथा पदों से संबंधित अपवाद भी हैं। इसलिए न्यूनतम मजदूरी के अधिकार का परीक्षण करते समय दोनों शब्दों को एक-दूसरे का पर्याय नहीं मानना चाहिए।
न्यूनतम मजदूरी की दर निर्धारित करने के लिए संहिता की धारा 6 महत्वपूर्ण है। इसके अंतर्गत उपयुक्त सरकार कर्मचारियों के कौशल स्तर, भौगोलिक क्षेत्र और कार्य की प्रकृति जैसे कारकों को ध्यान में रखते हुए न्यूनतम मजदूरी निर्धारित कर सकती है। इसी कारण अकुशल, अर्धकुशल, कुशल और अत्यधिक कुशल कर्मचारियों के लिए अलग-अलग दरें हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, सामान्य डेटा प्रविष्टि का कार्य करने वाले कर्मचारी और विशेष तकनीकी दक्षता के साथ जटिल सॉफ्टवेयर संचालित करने वाले कर्मचारी की कौशल श्रेणी अलग हो सकती है। इस प्रकार, सभी कर्मचारियों को समान दर देना आवश्यक नहीं है, लेकिन पात्र कर्मचारी को लागू वैधानिक न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान नहीं किया जा सकता।
इसके साथ ही धारा 9 के अंतर्गत केंद्र सरकार को Floor Wage अर्थात आधारभूत न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने का अधिकार दिया गया है। इसका उद्देश्य देश में न्यूनतम मजदूरी निर्धारण के लिए एक आधारभूत स्तर सुनिश्चित करना है। केंद्र सरकार भौगोलिक क्षेत्रों के अनुसार अलग-अलग Floor Wage निर्धारित कर सकती है। उपयुक्त सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी इस आधारभूत दर से कम नहीं हो सकती। यदि किसी क्षेत्र में पहले से अधिक न्यूनतम मजदूरी लागू है, तो Floor Wage निर्धारित होने मात्र से उस उच्चतर दर को कम नहीं किया जा सकता।
इस व्यवस्था के प्रभावी क्रियान्वयन में नियोक्ताओं की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण है। उन्हें अपने प्रतिष्ठान में कार्यरत कर्मचारियों की वास्तविक कार्य-प्रकृति और कौशल श्रेणी का सही निर्धारण करना चाहिए। इसके साथ ही लागू न्यूनतम मजदूरी अधिसूचना का पालन, वेतन अभिलेखों का रखरखाव, वेतन पर्ची और उपस्थिति से संबंधित आवश्यक रिकॉर्ड संधारित करना भी जरूरी है। आउटसोर्सिंग और संविदा आधारित सेवाओं में कार्यरत कर्मचारियों के मामले में भी न्यूनतम मजदूरी संबंधी वैधानिक दायित्वों का पालन आवश्यक है। केवल किसी कार्य को ठेकेदार या सेवा प्रदाता कंपनी को सौंप देने से संबंधित कानूनी जिम्मेदारियां स्वतः समाप्त नहीं हो जातीं।
इस प्रावधान के कई महत्वपूर्ण लाभ हैं। इससे सेवा क्षेत्र, निजी अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों, कार्यालयों और डिजिटल अर्थव्यवस्था में कार्यरत कर्मचारियों को भी न्यूनतम मजदूरी के वैधानिक संरक्षण का आधार मिलता है। इससे रोजगार के नाम या प्रतिष्ठान की प्रकृति का हवाला देकर कर्मचारियों को न्यूनतम मजदूरी से वंचित करना कठिन होगा। साथ ही, श्रम बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और कर्मचारियों के बीच समान वैधानिक संरक्षण को बढ़ावा मिल सकता है।
हालांकि, इसके प्रभावी क्रियान्वयन में कुछ चुनौतियां भी हैं। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए वेतन अभिलेख, कौशल वर्गीकरण और विभिन्न अधिसूचनाओं का अनुपालन अतिरिक्त प्रशासनिक एवं वित्तीय जिम्मेदारी बन सकता है। इसके अतिरिक्त, डेटा एंट्री ऑपरेटर, कंप्यूटर ऑपरेटर और प्रशासनिक सहायक जैसे पदों के कार्यों में समानता होने के कारण कौशल श्रेणी निर्धारित करने में विवाद उत्पन्न हो सकते हैं। अनौपचारिक रोजगार, कर्मचारियों में जागरूकता की कमी और कमजोर निरीक्षण व्यवस्था भी प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा बन सकती है।
यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, कनाडा और जापान जैसे देशों में भी न्यूनतम मजदूरी के लिए व्यापक वैधानिक व्यवस्थाएं हैं। इन देशों में राष्ट्रीय अथवा संघीय स्तर पर आधारभूत न्यूनतम मजदूरी के साथ क्षेत्र, उद्योग, कौशल और स्थानीय आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग दरें निर्धारित की जाती हैं। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि व्यापक न्यूनतम मजदूरी संरक्षण और क्षेत्र विशेष के अनुसार अलग-अलग दरें एक साथ लागू की जा सकती हैं।
भारत में भी इस व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए रोजगारों और कौशल श्रेणियों का स्पष्ट वर्गीकरण, छोटे प्रतिष्ठानों के लिए सरल अनुपालन प्रक्रिया, डिजिटल वेतन अभिलेख और प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली विकसित करना आवश्यक है। कर्मचारियों को उनके अधिकारों और लागू न्यूनतम मजदूरी दरों की जानकारी सरल माध्यमों से उपलब्ध कराई जानी चाहिए। साथ ही, न्यूनतम मजदूरी की दरों की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए, ताकि वे महंगाई और जीवन-यापन की लागत के अनुरूप बनी रहें।
अंततः, मजदूरी संहिता, 2019 की धारा 5 न्यूनतम मजदूरी के अधिकार को व्यापक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। धारा 5 अधिकार का आधार प्रदान करती है, धारा 6 न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण की व्यवस्था करती है और धारा 9 आधारभूत न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करने का प्रयास करती है। इन प्रावधानों का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब कर्मचारी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हों, नियोक्ता अपनी जिम्मेदारियों का पालन करें और सरकार की प्रवर्तन एवं शिकायत निवारण व्यवस्था प्रभावी हो। इसका मूल उद्देश्य प्रत्येक पात्र कर्मचारी को उसके श्रम के अनुरूप सम्मानजनक और वैधानिक न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करना है।
