कोचिंग संस्कृति के शिकंजे में शिक्षा

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अवनीश कुमार गुप्ता

भारतीय समाज में शिक्षा को हमेशा सामाजिक परिवर्तन, बौद्धिक विकास और राष्ट्रीय निर्माण का सबसे प्रभावशाली साधन माना गया है। प्राचीन गुरुकुलों से लेकर आधुनिक विश्वविद्यालयों तक शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करना रहा है जो विवेकशील, नैतिक, संवेदनशील और समाजोपयोगी हो। शिक्षा व्यक्ति को केवल जीविका कमाने की क्षमता नहीं देती, बल्कि जीवन को समझने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने की दृष्टि भी प्रदान करती है। दुर्भाग्य से पिछले तीन दशकों में भारतीय शिक्षा व्यवस्था के समानांतर विकसित हुई कोचिंग संस्कृति ने शिक्षा के इसी मूल उद्देश्य को गंभीर चुनौती दी है। आज स्थिति यह है कि ज्ञान, जिज्ञासा और बौद्धिक विकास की अपेक्षा परीक्षा, अंक, रैंक और चयन को अधिक महत्व दिया जाने लगा है। परिणामस्वरूप शिक्षा का व्यापक मानवीय स्वरूप सिकुड़कर प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी तक सीमित होता दिखाई दे रहा है।

कोचिंग संस्थानों का उदय अचानक नहीं हुआ। यह हमारी औपचारिक शिक्षा व्यवस्था की कमजोरियों और समाज की बढ़ती आकांक्षाओं का परिणाम था। उच्च शिक्षा संस्थानों और सरकारी नौकरियों में सीटों की सीमित संख्या, बढ़ती जनसंख्या, तीव्र प्रतिस्पर्धा तथा बेहतर जीवन की इच्छा ने विद्यार्थियों को अतिरिक्त मार्गदर्शन की ओर आकर्षित किया। प्रारंभिक दौर में कोचिंग संस्थान उन छात्रों के लिए सहायक मंच थे जिन्हें किसी विशेष विषय में अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता होती थी। लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था इतनी विस्तृत और प्रभावशाली हो गई कि उसने विद्यालयों और महाविद्यालयों की भूमिका को ही चुनौती देना शुरू कर दिया।

आज देश के अनेक शहरों में कोचिंग उद्योग एक विशाल आर्थिक तंत्र का रूप ले चुका है। राजस्थान का कोटा, उत्तर प्रदेश का प्रयागराज, दिल्ली का मुखर्जी नगर, हैदराबाद, पुणे, पटना और कई अन्य शहर शिक्षा से अधिक कोचिंग के लिए पहचाने जाने लगे हैं। हजारों छात्र अपने घरों से दूर जाकर वर्षों तक केवल प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे रहते हैं। उनके दैनिक जीवन का केंद्र विद्यालय या विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि कोचिंग संस्थान बन जाते हैं। यह परिवर्तन केवल संस्थागत बदलाव नहीं है; यह शिक्षा के चरित्र में आए गहरे परिवर्तन का संकेत है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में सफलता प्राप्त करना है? यदि नहीं, तो वर्तमान व्यवस्था किस दिशा में जा रही है? आज अधिकांश विद्यार्थी किसी विषय को उसकी बौद्धिक सुंदरता या व्यावहारिक उपयोगिता के कारण नहीं पढ़ते, बल्कि इसलिए पढ़ते हैं क्योंकि वह परीक्षा के पाठ्यक्रम का हिस्सा है। विज्ञान, गणित, इतिहास, साहित्य और समाजशास्त्र जैसे विषयों का अध्ययन जिज्ञासा से अधिक अंकों के लिए किया जाने लगा है। विद्यार्थियों को यह बताया जाता है कि कौन-सा अध्याय महत्वपूर्ण है, कौन-सा प्रश्न बार-बार पूछा जाता है और किस प्रकार न्यूनतम समय में अधिकतम अंक प्राप्त किए जा सकते हैं। इससे शिक्षा का उद्देश्य समझ विकसित करने से हटकर परीक्षा प्रबंधन तक सीमित हो जाता है।

यह प्रवृत्ति रचनात्मकता और मौलिक चिंतन के लिए भी चुनौती बन रही है। महान वैज्ञानिक, साहित्यकार, दार्शनिक और नवप्रवर्तक केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करके नहीं बने। उनकी सफलता के पीछे स्वतंत्र चिंतन, प्रयोग करने का साहस और असफलता से सीखने की क्षमता थी। लेकिन वर्तमान कोचिंग-केंद्रित वातावरण में विद्यार्थियों को निर्धारित उत्तरों और निश्चित पद्धतियों के भीतर सोचने के लिए प्रेरित किया जाता है। इससे उनके व्यक्तित्व का स्वाभाविक विकास बाधित हो सकता है। वे समस्या का समाधान खोजने के बजाय पहले से तैयार समाधान याद करने लगते हैं।

कोचिंग संस्कृति का एक अन्य गंभीर प्रभाव सामाजिक असमानता के रूप में सामने आया है। गुणवत्तापूर्ण कोचिंग प्राप्त करना आज अत्यंत महंगा हो गया है। प्रतिष्ठित संस्थानों की फीस कई परिवारों की वार्षिक आय के बराबर होती है। इसके अतिरिक्त आवास, भोजन, अध्ययन सामग्री और अन्य खर्च अलग से होते हैं। आर्थिक रूप से सक्षम परिवार अपने बच्चों को सर्वश्रेष्ठ सुविधाएं उपलब्ध करा सकते हैं, जबकि कमजोर वर्ग के छात्र अनेक बाधाओं का सामना करते हैं। इस प्रकार शिक्षा, जो समान अवसर का माध्यम होनी चाहिए, धीरे-धीरे आर्थिक संसाधनों पर निर्भर होती जा रही है।

चयन नहीं है। एक अच्छा शिक्षक, वैज्ञानिक, कलाकार, लेखक, उद्यमी या सामाजिक कार्यकर्ता भी उतना ही महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है जितना किसी अन्य पेशे का व्यक्ति।

समाज को भी सफलता की अपनी परिभाषा पर पुनर्विचार करना होगा। यदि हम केवल अंकों और रैंक के आधार पर व्यक्तियों का मूल्यांकन करेंगे, तो शिक्षा का मानवीय पक्ष कमजोर पड़ता जाएगा। हमें ऐसे वातावरण का निर्माण करना होगा जहां सीखने, प्रश्न पूछने, प्रयोग करने और असफलताओं से सीखने को प्रोत्साहन मिले।

अंततः कोचिंग संस्कृति का प्रश्न केवल शिक्षा व्यवस्था का प्रश्न नहीं है; यह उस समाज की दिशा का प्रश्न है जिसे हम भविष्य में निर्मित करना चाहते हैं। यदि शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में सफलता रह जाएगा, तो हम कुशल परीक्षार्थी तो तैयार कर सकते हैं, लेकिन विचारशील नागरिक नहीं। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके विश्वविद्यालयों, विद्यालयों और युवाओं की जिज्ञासा में निहित होती है, न कि केवल उसकी परीक्षा प्रणालियों में।

आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को फिर से ज्ञान, विवेक, सृजनशीलता और मानवीय मूल्यों से जोड़ा जाए। कोचिंग संस्कृति की उपयोगिता अपनी जगह हो सकती है, लेकिन उसे शिक्षा का विकल्प नहीं बनने दिया जा सकता। जब विद्यालय सीखने का केंद्र बनेंगे, परीक्षाएं समझ का मूल्यांकन करेंगी और समाज सफलता को व्यापक दृष्टि से देखेगा, तभी शिक्षा अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त कर सकेगी। यही वह मार्ग है जो भारत को केवल प्रतिभाशाली युवाओं का नहीं, बल्कि विचारशील, नवाचारी और संवेदनशील नागरिकों का राष्ट्र बना सकता है।

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