क्या देश में सर्व गुण सम्पन्न गुलाम तैयार किए जा रहे हैं?

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क्या देश में सर्व गुण सम्पन्न गुलाम तैयार किए जा रहे हैं?

(विवेकानंद-विनायक फीचर्स)

कुछ सवाल हैं जो आम भारतीय को सरकारों से नहीं, अपने आप से पूछने चाहिए। अगर इनका जवाब मिल सका तो शायद समझ पाएंगे कि बच्चों के भविष्य के साथ क्या हो रहा है? वह पढ़ा-लिखा, कोई सवाल न करने वाला मजदूर बनने वाला है या उसके भीतर रचनात्मकता के बीज बोए जा रहे हैं? शायद पता चल सकेगा कि देश किस दिशा में जा रहा है और जिस दिशा में जा रहा है, उसके लिए जिम्मेदार कौन है?

भारत की तीन बड़ी कंपनियां टाटा, अंबानी और अडानी हैं। आईटी सेक्टर में झंडे गाड़ने वाली कई कंपनियां भी हैं। लेकिन अब तक हमारे पास गूगल जैसा कोई सर्च इंजन नहीं है। हालांकि तीन सर्च इंजन हैं ‘आई भारत’, ‘क्यू-मामू’ और ‘जस्टडायल’ लेकिन इनका इस्तेमाल न के बराबर है। एक ‘कॉमेट’ नाम के सर्च इंजन पर भी काम चल रहा है। गूगल एक भारतीय के हाथों संचालित हो रहा है, लेकिन इंटरनेट पर गूगल की बादशाहत के सामने कोई भारतीय चुनौती क्यों नहीं है?

देश में सबसे ज्यादा बहस किस विषय पर होती है? शिक्षा पर, स्वास्थ्य पर, रोजगार पर या फिर धार्मिक विवादों पर? जिस पर सबसे ज्यादा बहस होती है वही हमारी रुचि का सूचक है। जैसी रुचि, वैसे विचार होंगे, यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है। इन बहसों से हमें हासिल क्या हो रहा है? जो हासिल हो रहा है क्या वह देश के युवाओं की प्रगति का रास्ता खोल रहा है?

यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस की साल 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार बीते 10 साल में 89,441 सरकारी स्कूल बंद हो गए। इन 10 साल में 42,944 नए प्राइवेट स्कूल खोले गए हैं। यानी जहां सरकारी स्कूलों की संख्या में 8 प्रतिशत की कमी आई है, वहीं निजी स्कूलों की संख्या बढ़ी है। शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2014-15 से 2023-24 तक प्राइवेट स्कूलों की संख्या 42,944 बढ़कर 2,88,164 से 3,31,108 हो गई है।

जो सरकारी स्कूल बंद हुए उनमें पढ़ने वाले बच्चों का क्या हुआ? पढ़ाई छोड़ी, सरकारी स्कूलों में ही दाखिला लिया या निजी स्कूलों में गए? सरकारों के पास हर सवाल का तार्किक जवाब है। इसलिए आपको सोचना है कि निजी स्कूलों की लोकप्रियता क्यों बढ़ी? शिक्षा नीति के खूबसूरत उद्देश्य पर देश के बड़े नेता, उद्योगपति, ब्यूरोक्रेट्स और नव धनाढ्य वर्ग क्यों नहीं रीझ रहा है? वह क्यों अपने बच्चों को उन बड़े-बड़े स्कूलों में भेजता है जो देश की कथित उन्नत शिक्षा नीति अपनाने के लिए बाध्य नहीं हैं।

कहीं ऐसा तो नहीं कि देश का विशाल मध्यमवर्ग किसी सुनियोजित कुचक्र में फंसा है? जिस पर उसकी खुद की भी स्वीकृति दिखती है। सरकारी स्कूलों में अव्यवस्था से लोग अपने बच्चों के लिए सस्ते निजी स्कूलों की तलाश करते हैं। इन स्कूलों में क्या सिखाया जा रहा है? विज्ञान और इतिहास में जो बदलाव किए जा रहे हैं, वे बच्चे को किस तरह प्रभावित कर रहे हैं?

ध्यान रखिए कंपनियों को बैल की तरह काम करने वाले योग्य और सस्ते मजदूर चाहिए और सियासत को वोटर चाहिए। तो क्या बुनियाद ही ऐसी तैयार की जा रही है जिसमें अनुशासन और संस्कार के नाम पर मौन, अधिकारों की बात पर संतोष सिखाया जाता हो और आत्ममुग्ध रहने के लिए इतिहास पर गर्व का भाव हो? और जो इस दायरे से बाहर निकलने की कोशिश करे उस पर अपराधी की तरह कार्रवाई की जाए।

हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस माधव जामदार ने कहा कि विरोध करने वालों पर मुकदमे हो रहे हैं, तड़ीपार किया जा रहा है। ये क्या हो रहा है? क्या सभी नागरिकों को गुलाम बनाया जा रहा है? न्यायाधीश ने कहा कि केवल सरकार की नीतियों का विरोध करने के कारण किसी नागरिक के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। वे न प्रदर्शन कर सकते हैं, न आंदोलन कर सकते हैं। आज इतने पेपर लीक हो रहे हैं। अगर लोग विरोध करेंगे तो उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज कर दिए जाएंगे। यह क्या तरीका है? कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की नौकर नहीं है। पुलिस जनता की सेवक है। हल्के-फुल्के अंदाज में न्यायाधीश ने यह भी साफ कर दिया कि वे जानते हैं कि पूरे महाराष्ट्र में हॉर्स ट्रेडिंग चल रही है। एक वॉशिंग मशीन तो है।

मामूली से बयानों पर हंगामा बरपा देने वालों ने हाईकोर्ट की इस टिप्पणी पर कोई बहस नहीं की। तो क्या यह हमें दिख नहीं रहा है या अनुशासन और संस्कार के नाम पर मौन हैं? अधिकारों को लेकर संतोष का भाव और इतिहास को लेकर आत्ममुग्धता आ गई है? इतनी आत्ममुग्धता कि अपने ही बच्चों के हक में सवाल उठाने वालों के खिलाफ खड़े हो जा रहे हैं।

…तो फिर अब गुलाम के और कौन से गुण आने शेष रह गए। *(विनायक फीचर्स)*

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