व्यंग्य : हर विधायक को कार और 75 हजार-जनसेवा का नया मॉडल
(संजय एम तराणेकर)
देश में जनसेवा का स्तर आखिरकार इतना ऊँचा उठ गया है कि अब जनता की सेवा करने के लिए विधायक जी को कार और 75 हजार रुपये महीना मिलेंगे। यानी जनता परेशान हो तो विधायक जी दौड़कर उसके पास जाएँगे-बस शर्त इतनी है कि दौड़ना कार में बैठकर हो!
खबर सुनते ही आम आदमी की आँखों में चमक आ गई। उसे लगा कि शायद अब उसकी समस्याएँ भी वीआईपी हो गई हैं। कल तक नाली, सड़क, बिजली और पानी की शिकायत लेकर जनता पैदल विधायक के घर जाती थी। अब विधायक जी कार लेकर जनता के पास जाएँगे। फर्क सिर्फ इतना है कि कार सरकारी होगी और पेट्रोल का इंतजाम… खैर, वह भविष्य के किसी बड़े पैकेज में होगा!
कहा गया है कि विधायक अपने-अपने क्षेत्र के गाँव-कस्बों में जाएँ, आम लोगों की परेशानी सुनें और उसका समाधान करें। विचार बहुत सुंदर है। अब कल्पना कीजिए-विधायक जी कार से गाँव पहुँचे। गाँव वाला बोला, “साहब, सड़क टूटी पड़ी है।”
विधायक जी बोले, “बहुत अच्छा! रिपोर्ट में लिखो-जनता से मिलकर सड़क की समस्या समझी।”
दूसरा बोला, “साहब, पानी नहीं आता।”
जवाब मिला, “बहुत गंभीर समस्या है। इसे भी रिपोर्ट में डालेंगे।”
तीसरा बोला, “साहब, रोजगार चाहिए।”
विधायक जी ने मुस्कुराकर कहा, “भाई, मेरी भी नौकरी जनता ने ही दी है, अभी तो मैं उसकी ईएमआई चुका रहा हूँ!”
असल में लोकतंत्र में सबसे ज्यादा मेहनत जनता करती है। वह टैक्स देती है, वोट देती है, लाइन में लगती है और फिर अपनी समस्या लेकर नेताओं के पास जाती है। अब व्यवस्था ने सोचा है कि कम-से-कम नेताओं को जनता तक पहुँचने के लिए कार सुविधा तो मिलनी ही चाहिए।
और 75 हजार रुपये महीना! यह राशि सुनकर सरकारी कर्मचारी ने अपनी तनख्वाह देखी, किसान ने अपनी फसल का भाव देखा और बेरोजगार युवक ने अपनी डिग्री। तीनों ने एक-दूसरे को देखा और फिर चुपचाप मोबाइल जेब में रख लिया।
सहायक के लिए अलग से 25 हजार रुपये महीना भी मिलेंगे। यानी जनसेवा अब टीमवर्क हो गई है। विधायक जी जनता की समस्या सुनेंगे और सहायक जी उसे नोट करेंगे। फिर रिपोर्ट बनेगी, रिपोर्ट जाएगी, बैठक होगी, बैठक की रिपोर्ट बनेगी और अंत में जनता वही खड़ी मिलेगी-उसी टूटी सड़क के किनारे!
सबसे मजेदार बात यह है कि हर तीन महीने में रिपोर्ट भी देनी होगी कि कितने अधूरे काम पूरे किए और कितनी समस्याएँ हल कीं। यह व्यवस्था सच में लागू हो गई तो नेताओं की असली परीक्षा शुरू होगी। क्योंकि जनता की समस्या सुनना आसान है, समस्या का समाधान करना थोड़ा महँगा पड़ता है!
जनता भी अब समझदार हो गई है। वह कहेगी-“साहब, हमारी समस्या सुनने के लिए कार मिली है तो ठीक है, लेकिन अगली बार कार में हमारी सड़क भी डालकर ले जाइए। बहुत टूटी हुई है।”
कुल मिलाकर लोकतंत्र में एक नया अध्याय खुल रहा है-जनप्रतिनिधि जनता के और करीब आएँगे, बशर्ते कार की दूरी और जनता की दूरी के बीच पेट्रोल का बजट अनुमति दे।
अब देखना यह है कि 75 हजार रुपये जनता की समस्याओं पर खर्च होते हैं या समस्याएँ 75 हजार रुपये की देखकर खुद ही विधायक जी के पास पहुँच जाती हैं!
क्योंकि लोकतंत्र में जनता को सबसे ज्यादा भरोसा इसी बात पर रहता है कि घोषणा बड़ी हो तो उम्मीद भी बड़ी रखनी चाहिए-भले ही सड़क छोटी और टूटी हुई क्यों न हो।

