प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी.के. मिश्रा ने 20वें सांख्यिकी दिवस 2026 को संबोधित किया
जीडीपी, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक तथा औद्योगिक उत्पादन सूचकांक सहित प्रमुख व्यापक आर्थिक संकेतकों को नए आधार वर्ष के साथ अद्यतन किया जा रहा है, ताकि वे भारत की विकसित होती अर्थव्यवस्था को अधिक सटीक रूप से प्रतिबिंबित कर सकें: डॉ. पी.के. मिश्रा
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की परिकल्पना के अनुरूप, सुशासन का भविष्य डेटा-आधारित निर्णय प्रक्रिया में निहित है; विकसित भारत की यात्रा विश्वसनीय आँकड़ों पर आधारित होनी चाहिए: डॉ. पी.के. मिश्रा
डॉ. पी.के. मिश्रा ने उच्च गुणवत्ता, गोपनीयता, पारदर्शिता और आँकड़ों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए मजबूत संस्थागत ढाँचे विकसित करने के प्रयासों को याद किया
भारत के तीव्र डिजिटल परिवर्तन ने प्रशासनिक डेटा का विशाल भंडार तैयार किया है, जिसे रणनीतिक राष्ट्रीय संपदा के रूप में देखा जाना चाहिए: डॉ. पी.के. मिश्रा
प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी.के. मिश्रा ने आज 20वें सांख्यिकी दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया। 20वें सांख्यिकी दिवस समारोह को संबोधित करते हुए डॉ.मिश्रा ने प्रोफेसर प्रशांत चंद्र महालनोबिस की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित तथा भारत की सांख्यिकीय प्रणाली के निर्माण में उनके युगांतकारी योगदान को स्मरण किया और साक्ष्य-आधारित सुशासन के लिए मजबूत सांख्यिकी के स्थायी महत्व पर जोर दिया। उन्होंने सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय को उसके विजन दस्तावेज़ 2026–31, सतत विकास लक्ष्यों पर प्रगति रिपोर्ट तथा श्रम बाज़ार और अनौपचारिक उद्यमों के प्रथम शहर-स्तरीय अनुमानों के प्रकाशन पर बधाई दी। उन्होंने प्रोफेसर अरूप बोस को सुखात्मे राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किए जाने पर भी बधाई दीं।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के डेटा-आधारित सुशासन और ‘विकसित भारत @2047’ के विजन का उल्लेख करते हुए डॉ. मिश्रा ने कहा, “इस वर्ष के सांख्यिकी दिवस के विषय ‘प्रशासनिक आँकड़ों की क्षमता का उपयोग’ भारत की सांख्यिकीय प्रणाली को सुदृढ़ बनाने तथा साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को बढ़ावा देने की दिशा में एक परिवर्तनकारी कदम है। यह विषय अत्यंत प्रासंगिक और समयानुकूल है।”
सांख्यिकी के क्षेत्र में भारत की अग्रणी भूमिका का उल्लेख करते हुए डॉ. पी.के. मिश्रा ने कहा कि 1950 के दशक में भारत ने विश्व की सर्वश्रेष्ठ सर्वेक्षण-आधारित सांख्यिकीय प्रणालियों में से एक का निर्माण किया था। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण वैश्विक स्तर पर एक आदर्श मॉडल बनकर उभरा, जिसने विकासशील देशों में अनुसंधान और नीति-निर्माण को नई दिशा प्रदान की। उन्होंने कहा, “प्रोफेसर पी.सी. महालनोबिस के दूरदर्शी योगदान, जिन्होंने भारतीय सांख्यिकी संस्थान और ‘सांख्य’ पत्रिका की स्थापना की, ने भारत में आधुनिक सांख्यिकीय विज्ञान की मजबूत नींव रखी तथा उनके विचारों ने द्वितीय पंचवर्षीय योजना के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।” अपने शैक्षणिक अनुभवों का उल्लेख करते हुए डॉ. मिश्रा ने कहा कि भारतीय सांख्यिकीय आँकड़ों और कार्यप्रणालियों को लंबे समय से विश्व के अग्रणी शोधकर्ताओं द्वारा अत्यधिक उपयोगी माना जाता रहा है। उन्होंने प्रोफेसर सी.आर. राव और प्रोफेसर पी.वी. सुखात्मे जैसे प्रख्यात सांख्यिकीविदों के स्थायी योगदान को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनके पथप्रदर्शक कार्य आज भी वैश्विक स्तर पर सांख्यिकी के क्षेत्र को निरंतर प्रभावित कर रहे हैं।
भारत की सांख्यिकीय प्रणाली के आधुनिकीकरण के बारे में विचार प्रकट करते हुए डॉ. पी.के. मिश्रा ने स्वीकार किया कि दशकों तक उत्कृष्ट प्रदर्शन करने के बाद इस प्रणाली को पुराने हो चुके डेटासेट, आँकड़ों के प्रसार में विलंब, बिखरी हुई सांख्यिकीय संरचना, आँकड़ों की गुणवत्ता में असमानता तथा पेशेवर क्षमता में कमी जैसी कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा, “इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एमओएसपीआई) ने विशेषज्ञों, प्रमुख संस्थानों और अन्य हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श के बाद एक समग्र सुधार प्रक्रिया शुरू की। इन चर्चाओं के आधार पर एमओएसपीआई ने संस्थागत निगरानी तंत्र के अंतर्गत समयबद्ध क्रियान्वयन के लिए 216 सिफारिशों को स्वीकार किया।” डॉ. मिश्रा ने बताया कि इन सुधारों के परिणामस्वरूप उपयोगकर्ताओं की आवश्यकताओं पर आधारित नए सर्वेक्षण शुरू किए गए हैं, प्रमुख व्यापक आर्थिक संकेतकों को अद्यतन किया जा रहा है, आँकड़ों के प्रसार में सुधार हुआ है तथा प्रक्रियागत और प्रणालीगत स्तर पर महत्वपूर्ण सुधार किए गए हैं। इन पहलों ने एक अधिक सुदृढ़, विश्वसनीय और भविष्य के लिए तैयार सांख्यिकीय प्रणाली की मजबूत नींव रखी है।
वर्ष 2020 से 2025 के दौरान सांख्यिकीय सुधारों को प्रभावी नेतृत्व प्रदान करने के लिए एमओएसपीआई की सराहना करते हुए डॉ. पी.के. मिश्रा ने कहा कि वर्ष 2020 से प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) और एमओएसपीआई ने मिलकर सांख्यिकीय प्रणाली से जुड़े मुद्दों का गहन विश्लेषण किया, उपायों की पहचान की और विभिन्न चुनौतियों के समाधान के लिए ठोस कदम उठाए। डॉ. मिश्रा ने कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस पूरी सुधार प्रक्रिया में एक उत्प्रेरक और सहायक की भूमिका निभाई, जिसकी बदौलत मंत्रालय अपनी संस्थागत विशेषज्ञता और क्षमताओं का प्रभावी उपयोग करते हुए अधिक सुदृढ़, विश्वसनीय और भविष्य के लिए तैयार सांख्यिकीय प्रणाली के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ सका।
इस वर्ष के सांख्यिकी दिवस के विषय ‘प्रशासनिक आँकड़ों की क्षमता का उपयोग’ पर बल देते हुए डॉ. पी.के. मिश्रा ने कहा कि भारत के तीव्र डिजिटल परिवर्तन ने प्रशासनिक आँकड़ों का विशाल भंडार तैयार किया है, जो साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण और सुशासन को उल्लेखनीय रूप से सशक्त बना सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा, “प्रशासनिक आँकड़ों को रणनीतिक राष्ट्रीय संपदा के रूप में देखा जाना चाहिए, जिससे बेहतर योजनाएँ बनाई जा सकें, लक्षित सेवा वितरण सुनिश्चित हो तथा समयबद्ध निर्णय लिए जा सकें।” उन्होंने केंद्र सरकार के मंत्रालयों, विभागों, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल देते हुए परस्पर संगत और एकीकृत डेटा इकोसिस्टम विकसित करने की वकालत की। उन्होंने कहा कि ऐसा तंत्र डेटा की गोपनीयता, सुरक्षा और निजता के उच्चतम मानकों को बनाए रखते हुए सुरक्षित डेटा साझाकरण को संभव बनाएगा। डॉ. मिश्रा ने संस्थानों में मानव क्षमता, डेटा साक्षरता और विश्लेषणात्मक क्षमताओं के निर्माण की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि विश्वसनीय और परस्पर संगत डेटासेट शासन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को जिम्मेदारी से अपनाने के लिए आधार प्रदान करेंगे।
भारत की सांख्यिकीय प्रणाली में जारी परिवर्तन पर प्रकाश डालते हुए डॉ. पी.के. मिश्रा ने कहा,
“प्रशासनिक आँकड़ों को अपनाना समावेशी और साक्ष्य-आधारित शासन के प्रति देश की लंबे समय से चली आ रही प्रतिबद्धता को दर्शाता है।”
उन्होंने कहा कि मंत्रालय ने कंप्यूटर-सहायता प्राप्त व्यक्तिगत साक्षात्कार (या कंप्यूटर-असिस्टेड पर्सनल इंटरव्यूइंग- सीएपीआई) के माध्यम से सर्वेक्षण पद्धतियों का आधुनिकीकरण किया है, जिला-स्तरीय अनुमान तैयार करने के लिए सैंपलिंग डिज़ाइन में संशोधन किया गया है, उच्च-आवृत्ति सर्वेक्षण शुरू किए गए हैं तथा आधिकारिक आँकड़ों को जारी करने में लगने वाला समय भी कम किया गया है। उन्होंने कहा, “जीडीपी, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक सहित प्रमुख व्यापक आर्थिक संकेतकों को नए आधार वर्ष के साथ अद्यतन किया जा रहा है, ताकि वे भारत की विकसित होती अर्थव्यवस्था को अधिक सटीक रूप से प्रतिबिंबित कर सकें ।” उन्होंने कहा, “राष्ट्रीय मेटाडेटा संरचना 2.0 मशीन-पठनीय डेटा मानक, ओपन एपीआई तथा डिजिटल प्लेटफॉर्मों जैसे ई-सांख्यिकी, जीओआईस्टेट्स, पैमाना और ई-साक्षी जैसी पहलों के जरिए एक मजबूत प्रशासनिक डेटा इकोसिस्टम का विकास किया जा रहा है, जो डेटा की उपलब्धता, परस्पर संगतता और वास्तविक समय सुशासन को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।”
डॉ. पी.के. मिश्रा ने भारत की सांख्यिकीय प्रणाली में जारी परिवर्तन को सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय तथा विशेषज्ञ संस्थानों के सामूहिक प्रयासों की एक उल्लेखनीय सफलता बताया। उन्होंने कहा, “ये सुधार बिना किसी नई समिति के गठन या बाहरी सलाहकारों की सेवाएँ लिए ही संभव हो सके। युवा अधिकारियों की एक छोटी-सी टीम ने विभिन्न विशेषज्ञ संस्थानों की विविध सिफारिशों को एकीकृत कर उन्हें व्यावहारिक और क्रियान्वयन योग्य सुधारों में बदलने में अहम भूमिका निभाई।”
आगे की दिशा रेखांकित करते हुए डॉ. पी.के. मिश्रा ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की परिकल्पना के अनुरूप, सुशासन का भविष्य डेटा-आधारित निर्णय निर्माण में निहित है। उन्होंने बल देते हुए कहा कि जैसे-जैसे भारत एआई-रेडी डेटा सेट्स की ओर अग्रसर हो रहा है, सांख्यिकीय प्रणाली को विश्वास, स्वतंत्रता और वैज्ञानिक कठोरता के सिद्धांतों को बनाए रखना होगा। उन्होंने कहा, “प्रशासनिक आँकड़े तभी एक सशक्त राष्ट्रीय संपत्ति बन सकते हैं जब वे गुणवत्ता, गोपनीयता और पारदर्शिता के मजबूत मानकों पर आधारित हों। साथ ही, नए डेटा स्रोतों को अपनाते हुए आधिकारिक आँकड़ों की विश्वसनीयता और स्वतंत्रता को बनाए रखना भी अत्यंत आवश्यक है।”
डॉ. मिश्रा ने कहा कि यद्यपि कृत्रिम बुद्धिमत्ता सांख्यिकीय विश्लेषण और नीति-निर्माण के क्षेत्र में परिवर्तनकारी अवसर प्रदान करती है, फिर भी इसके उपयोग को मजबूत शासन-ढांचे द्वारा निर्देशित किया जाना चाहिए, ताकि पूर्वाग्रह, जवाबदेही और व्याख्येयता के मुद्दों को हल किया जा सके, और यह सुनिश्चित किया जा सके कि तकनीकी नवाचार आधिकारिक आँकड़ों की विश्वसनीयता को कमजोर करने के बजाय उसे और अधिक सुदृढ़ बनाए।
अपने संबोधन का समापन करते हुए डॉ. पी.के. मिश्रा ने कहा कि प्रशासनिक आँकड़ों की वास्तविक क्षमता केवल तकनीक के माध्यम से नहीं, बल्कि उन मजबूत संस्थागत ढाँचों के माध्यम से साकार होगी जो गुणवत्ता, गोपनीयता, पारदर्शिता और स्वतंत्रता के उच्च मानकों को सुनिश्चित करते हैं। उन्होंने प्रोफेसर पी.सी. महालनोबिस के उस दृष्टिकोण को दोहराया जिसमें शासन को तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित बताया गया है। डॉ. मिश्रा ने कहा कि विकसित भारत की यात्रा विश्वसनीय आँकड़ों पर आधारित होनी चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि हर नागरिक की गणना हो और कोई भी पीछे न छूटे। उन्होंने प्रोफेसर सी.आर. राव के इस कथन का उल्लेख किया कि “सभी निर्णय, अपने तर्क में, सांख्यिकी ही होते हैं,” और कहा कि राष्ट्रीय निर्णय-निर्माण की गुणवत्ता सीधे तौर पर आधिकारिक आँकड़ों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता पर निर्भर करती है। डॉ. मिश्रा ने सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय को इस अवसर पर संबोधन का अवसर प्रदान करने के लिए धन्यवाद दिया, प्रोफेसर अरूप बोस को सुखात्मे राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने पर बधाई दी, तथा सांख्यिकी समुदाय को राष्ट्र-निर्माण में उनके निरंतर योगदान के लिए शुभकामनाएँ दीं।
