200 साल पुराना ऐतिहासिक मंदिर खंडहर में तब्दील होने की कगार पर |

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राजेपुर/फर्रुखाबाद/

जनपद के राजेपुर ब्लॉक स्थित कड़हर गांव में करीब दो सौ वर्ष पुराना ऐतिहासिक मंदिर आज उपेक्षा और लापरवाही का शिकार होकर खंडहर में तब्दील होने की कगार पर पहुंच गया है। कभी अपनी भव्यता, स्थापत्य कला और धार्मिक आस्था के लिए पहचान रखने वाला यह प्राचीन मंदिर अब जर्जर दीवारों, उखड़ते पलस्तर और गहरी दरारों के बीच अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। हैरानी की बात यह है कि मंदिर के नाम पर 100 बीघा से अधिक कृषि भूमि दर्ज होने के बावजूद इसके संरक्षण और मरम्मत के लिए अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

ग्रामीणों के अनुसार मंदिर की हालत दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है। दीवारों पर काई जम चुकी है, कई हिस्सों का पलस्तर टूटकर गिर चुका है और छत व दीवारों में दरारें साफ दिखाई दे रही हैं। बरसात के मौसम में स्थिति और अधिक खतरनाक हो जाती है। लोगों का कहना है कि यदि जल्द ही मरम्मत कार्य शुरू नहीं कराया गया तो यह ऐतिहासिक धरोहर कभी भी ढह सकती है।

भारतीय और मुगलकालीन स्थापत्य का अद्भुत नमूना

करीब दो शताब्दी पुराने इस मंदिर की वास्तुकला लोगों को आज भी आकर्षित करती है। मंदिर का निर्माण भारतीय और मुगलकालीन शैली के अनोखे संगम के रूप में किया गया था। मुख्य द्वार पर बनी मेहराबदार नक्काशी, विशाल लकड़ी का प्रवेश द्वार, ऊपरी हिस्से में बने झरोखे और गुंबदनुमा शिखर इसकी ऐतिहासिक भव्यता को दर्शाते हैं। कला और इतिहास से जुड़े लोगों का मानना है कि यह मंदिर क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

हरदोई तक फैली मंदिर की संपत्ति

गांव के पूर्व प्रधान रामप्रताप सिंह ने बताया कि मंदिर के नाम पर लगभग 100 बीघा से अधिक कृषि भूमि दर्ज है, जो पड़ोसी जनपद हरदोई की सवायजपुर तहसील के विभिन्न गांवों—बारामऊ, शीशाला, पंचसाला, डीडवन और इस्माइलपुर—में फैली हुई है। पहले मंदिर की देखरेख प्रहलाद सिंह पुत्र भरत सिंह किया करते थे और वर्तमान में उनके पुत्र अर्जुन सिंह इसकी व्यवस्था संभाल रहे हैं। लेकिन पर्याप्त संसाधन और सरकारी सहयोग न मिलने के कारण मंदिर का जीर्णोद्धार नहीं हो पा रहा।

1857 की यादें समेटे ऐतिहासिक बावड़ी भी उपेक्षा का शिकार

कड़हर गांव सिर्फ इस प्राचीन मंदिर के लिए ही नहीं बल्कि वर्ष 1857 के गदर के समय निर्मित ऐतिहासिक बावड़ी के लिए भी प्रसिद्ध है। बताया जाता है कि इस बावड़ी का निर्माण ‘मेजर रॉबर्टगन साहब बहादुर तोपखाना साही’ और ‘मेजर चर्चूर’ द्वारा कराया गया था। पुरातत्व विभाग की टीम इस ऐतिहासिक स्थल का निरीक्षण भी कर चुकी है, लेकिन संरक्षण की दिशा में अब तक कोई प्रभावी पहल नहीं हुई।

राम दरबार और प्राचीन शिवलिंग से जुड़ी है आस्था

ग्रामीण मंगल सिंह, सुरेश अवस्थी, विजयकांत औदिच्य, रामकिशन बारी, राम सिंह कुशवाहा, ओमप्रकाश तिवारी और सत्यनारायण दुबे ने बताया कि मंदिर पूरे क्षेत्र की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मंदिर परिसर में बाबा भोलेनाथ का प्राचीन शिवलिंग स्थापित है, वहीं भगवान श्रीराम पूरे राम दरबार के साथ विराजमान हैं। यहां स्थापित मूर्तियां प्राचीन शैली में सफेद पत्थरों से निर्मित हैं, जो मंदिर की ऐतिहासिकता और धार्मिक महत्व को और बढ़ाती हैं।

विधायक से लगाई गुहार, कागजी प्रक्रिया में फंसा मामला

ग्राम प्रधान रामनिवास ने बताया कि मंदिर की जर्जर स्थिति को देखते हुए क्षेत्रीय विधायक सुशील कुमार शाक्य को लिखित रूप से अवगत कराया गया है। विधायक की ओर से मंदिर से जुड़े दस्तावेज और संपत्ति का विवरण मांगा गया है। प्रधान का कहना है कि जल्द ही सभी आवश्यक अभिलेख उपलब्ध करा दिए जाएंगे, ताकि शासन स्तर से बजट स्वीकृत हो सके और इस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षण मिल सके।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने समय रहते ध्यान नहीं दिया, तो आने वाली पीढ़ियां इस ऐतिहासिक धरोहर को केवल तस्वीरों और कहानियों में ही देख पाएंगी।

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