लोकलुभावन राजनीति और राज्यों पर बढ़ता ऋण बोझ
डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत में राज्यों का लगातार बढ़ता ऋण-से-सकल घरेलू उत्पाद अनुपात आज केवल एक आर्थिक संकेतक नहीं, बल्कि देश की वित्तीय स्थिरता और सहकारी संघवाद के लिए गंभीर चेतावनी बन चुका है। पिछले कुछ वर्षों में अधिकांश राज्यों का सार्वजनिक ऋण तेजी से बढ़ा है। राजस्व घाटे, लोकलुभावन योजनाओं, कमजोर कर-संग्रह प्रणाली तथा बजट से बाहर लिए गए उधारों ने राज्यों की वित्तीय स्थिति को कमजोर किया है। भारतीय रिज़र्व बैंक और वित्त आयोगों ने भी समय-समय पर इस बढ़ती ऋण प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की है। यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में यह संकट राज्यों की विकास क्षमता और संघीय संतुलन दोनों को प्रभावित कर सकता है।
राज्यों के बढ़ते ऋण का सबसे बड़ा कारण लगातार बढ़ता राजस्व घाटा है। कई राज्य अपनी नियमित आय से वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान और सब्सिडी जैसे खर्चों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। परिणामस्वरूप उन्हें सामान्य प्रशासनिक गतिविधियों के लिए भी उधार लेना पड़ता है। यह स्थिति आर्थिक दृष्टि से अत्यंत अस्थिर मानी जाती है क्योंकि उधार का उपयोग उत्पादक निवेश के बजाय दैनिक खर्चों में होने लगता है। पंजाब, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में ब्याज भुगतान और पेंशन व्यय लगातार बढ़ रहा है, जिससे विकासात्मक परियोजनाओं के लिए संसाधन सीमित होते जा रहे हैं।
लोकलुभावन राजनीति ने भी इस वित्तीय संकट को गहरा किया है। चुनावी प्रतिस्पर्धा के दौर में मुफ्त बिजली, कृषि ऋण माफी, मुफ्त परिवहन, नकद सहायता और विभिन्न प्रकार की सब्सिडी योजनाओं का विस्तार हुआ है। यद्यपि सामाजिक कल्याण योजनाएँ लोकतांत्रिक शासन का आवश्यक हिस्सा हैं, लेकिन जब वे वित्तीय क्षमता से अधिक बढ़ जाती हैं, तब वे राजकोषीय अनुशासन को कमजोर कर देती हैं। अधिकांश मुफ्त योजनाएँ दीर्घकालिक आर्थिक उत्पादकता नहीं बढ़ातीं, जिससे भविष्य में राजस्व सृजन की क्षमता कम हो जाती है और ऋण का बोझ बढ़ता जाता है।
वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था लागू होने के बाद राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता भी सीमित हुई है। पहले राज्यों के पास मूल्य वर्धित कर और अन्य अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से स्वतंत्र राजस्व स्रोत उपलब्ध थे, लेकिन अब वे काफी हद तक केंद्र के हस्तांतरण और वस्तु एवं सेवा कर क्षतिपूर्ति पर निर्भर हो गए हैं। कोरोना महामारी के दौरान वस्तु एवं सेवा कर क्षतिपूर्ति में देरी ने राज्यों की वित्तीय समस्याओं को और गंभीर बना दिया। इससे केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय मतभेद बढ़े, जिसने सहकारी संघवाद की भावना को प्रभावित किया।
कमजोर कर आधार भी राज्यों की आर्थिक कमजोरी का एक महत्वपूर्ण कारण है। कई राज्यों में संपत्ति कर, उपयोगकर्ता शुल्क और स्थानीय निकाय कर प्रभावी ढंग से वसूले नहीं जाते। नगरपालिकाओं और पंचायतों की वित्तीय स्थिति कमजोर होने के कारण राज्यों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। डिजिटल कर प्रशासन और आँकड़ा-आधारित निगरानी के अभाव में कर चोरी और राजस्व हानि की समस्या बनी रहती है।
इसके अलावा, बजट से बाहर लिए गए उधार और छिपी हुई देनदारियाँ राज्यों की वास्तविक वित्तीय स्थिति को और जटिल बना देती हैं। कई राज्य सार्वजनिक उपक्रमों, बिजली वितरण कंपनियों और विशेष प्रयोजन संस्थाओं के माध्यम से ऋण लेते हैं, जो आधिकारिक बजट में पूरी तरह दिखाई नहीं देते। इससे वास्तविक ऋण स्थिति का सही आकलन कठिन हो जाता है। भारतीय रिज़र्व बैंक ने कई बार चेतावनी दी है कि इस प्रकार की छिपी हुई देनदारियाँ भविष्य में बड़े वित्तीय संकट का कारण बन सकती हैं।
पूंजीगत व्यय की कम उत्पादकता भी ऋण वृद्धि का एक प्रमुख कारण है। यदि उधार लेकर शुरू की गई परियोजनाएँ समय पर पूरी नहीं होतीं या उनसे अपेक्षित आर्थिक लाभ प्राप्त नहीं होता, तो वे विकास के बजाय वित्तीय बोझ बन जाती हैं। कई राज्यों में प्रशासनिक देरी, भ्रष्टाचार और कमजोर परियोजना प्रबंधन के कारण निवेश का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।
राज्यों की बढ़ती ऋण निर्भरता भारतीय संघवाद को भी प्रभावित कर रही है। जब राज्य वित्तीय रूप से कमजोर होते हैं, तो वे अधिक केंद्रीय सहायता, विशेष पैकेज और अतिरिक्त उधारी सीमा की मांग करते हैं। इससे उनकी वित्तीय स्वायत्तता कम होती है और केंद्र पर निर्भरता बढ़ती है। दूसरी ओर, केंद्र द्वारा उधारी सीमा और वित्तीय शर्तें तय किए जाने से राजनीतिक विवाद उत्पन्न होते हैं। वस्तु एवं सेवा कर क्षतिपूर्ति और केंद्रीय कर हस्तांतरण जैसे मुद्दों पर केंद्र और राज्यों के बीच बढ़ते मतभेद इसी तनाव का उदाहरण हैं।
क्षेत्रीय असमानताएँ भी इस संकट के कारण बढ़ रही हैं। आर्थिक रूप से मजबूत राज्य अपेक्षाकृत बेहतर संसाधन जुटा लेते हैं, जबकि कमजोर राज्य लगातार ऋण जाल में फँसते जाते हैं। इससे विकास का संतुलन बिगड़ता है और संघीय ढाँचे में असमानता की भावना मजबूत होती है।
इस बढ़ते ऋण संकट से निपटने के लिए राज्यों को वित्तीय अनुशासन अपनाना होगा। राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम के लक्ष्यों का गंभीरता से पालन आवश्यक है। उधार का उपयोग मुख्यतः पूंजीगत व्यय और उत्पादक निवेश के लिए होना चाहिए, न कि दैनिक खर्चों के लिए। राज्यों को अपने कर आधार को मजबूत करना होगा। वस्तु एवं सेवा कर अनुपालन बढ़ाने, संपत्ति कर सुधार लागू करने तथा डिजिटल कर प्रशासन को बढ़ावा देने से राज्यों की स्वयं की आय में वृद्धि हो सकती है।
गैर-जरूरी सब्सिडी और लोकलुभावन योजनाओं का युक्तिकरण भी आवश्यक है। सरकारों को शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत ढाँचे और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना चाहिए, क्योंकि ये दीर्घकालिक आर्थिक विकास और राजस्व वृद्धि को बढ़ावा देते हैं। इसके अतिरिक्त, बजट से बाहर लिए गए उधार और सरकारी गारंटी को पूरी पारदर्शिता के साथ बजट में शामिल किया जाना चाहिए ताकि वास्तविक वित्तीय स्थिति स्पष्ट हो सके।
घाटे में चल रहे सार्वजनिक उपक्रमों और बिजली वितरण कंपनियों में संरचनात्मक सुधार भी समय की आवश्यकता है। स्थानीय निकायों को वित्तीय रूप से सशक्त बनाकर राज्यों का बोझ कम किया जा सकता है। नगरपालिकाओं और पंचायतों को अधिक वित्तीय अधिकार और संसाधन मिलने से विकेंद्रीकरण को भी मजबूती मिलेगी।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में राज्यों की आर्थिक मजबूती राष्ट्रीय विकास की आधारशिला है। इसलिए वित्तीय अनुशासन और सामाजिक कल्याण के बीच संतुलन बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। केवल उधार लेकर मुफ्त योजनाएँ चलाना दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता। केंद्र और राज्यों को सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाकर पारदर्शी, उत्तरदायी और टिकाऊ वित्तीय व्यवस्था विकसित करनी होगी।
अंततः, राज्यों का बढ़ता ऋण संकट भारतीय अर्थव्यवस्था और सहकारी संघवाद दोनों के लिए गंभीर चेतावनी है। यदि समय रहते संरचनात्मक सुधार नहीं किए गए, तो भविष्य में विकास व्यय, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है। वास्तविक समाधान कठोर मितव्ययिता में नहीं, बल्कि स्मार्ट वित्तीय प्रबंधन में निहित है, जहाँ उधार का उपयोग उत्पादक निवेश के लिए हो, कर आधार मजबूत हो और सार्वजनिक व्यय अधिक पारदर्शी एवं उत्तरदायी बने।
