यूपी में 2027 से पहले राम के नाम पर छिड़ी नई सियासी जंग

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यूपी में 2027 से पहले राम के नाम पर छिड़ी नई सियासी जंग

अजय कुमार,

वरिष्ठ पत्रकार

लखनऊ

लखनऊ की सियासत में इन दिनों जो हलचल दिख रही है, वह पिछले कई बरसों से चली आ रही तस्वीर से बिल्कुल अलग है। अब तक समाजवादी पार्टी को पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक यानी पीडीए के सहारे मैदान में उतरने वाली पार्टी के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव का रुख जिस तरह बदला है, उसने पुराने राजनीतिक समीकरणों को भी हिला दिया है। पार्टी दफ्तर में भजन-कीर्तन, सुंदरकांड का पाठ और अयोध्या-चित्रकूट से बुलाए गए साधु-संतों का आशीर्वाद लेने जैसी तस्वीरें अब सामान्य होती जा रही हैं। यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषक इसे अखिलेश यादव की सोची-समझी ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ रणनीति बता रहे हैं। गौर करने वाली बात यह है कि यह बदलाव अचानक नहीं आया। बीते कुछ महीनों में अखिलेश यादव मंदिरों में दर्शन करते, ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं का जिक्र करते और भंडारों में शामिल होते देखे गए हैं। इटावा में केदारेश्वर मंदिर बनवाने की पहल हो या रामचरितमानस बांटने जैसे कदम, सपा मुखिया लगातार यह संदेश देने की कोशिश में हैं कि भगवान राम किसी एक पार्टी की बपौती नहीं, बल्कि पूरे समाज की आस्था हैं। साथ ही वे यह भी जोड़ते हैं कि आस्था के नाम पर राजनीति करना गलत है, जिसका सीधा निशाना सत्तारूढ़ भाजपा पर है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को एक खास समुदाय की पार्टी बताकर मिली सियासी बढ़त से सपा ने साफ सबक लिया है, और यही वजह है कि अखिलेश अब मुस्लिम मुद्दों पर पहले जैसी मुखरता से बचते नजर आते हैं।

राजनीतिक हलकों में इसी बदलाव को ‘डायमंड कट्स डायमंड’ यानी लोहे को लोहे से काटने वाला फॉर्मूला कहा जा रहा है। मतलब साफ है, योगी आदित्यनाथ के तीखे हिंदुत्व और धार्मिक राष्ट्रवाद का जवाब अब सपा पुरानी धर्मनिरपेक्षता की भाषा से नहीं बल्कि खुद धर्म की जमीन पर उतरकर देना चाहती है। इसके पीछे तर्क यह है कि यूपी जैसे बड़े राज्य में सत्ता की चाबी बहुसंख्यक सनातनी मतदाता को नाराज करके हासिल नहीं की जा सकती। सपा की रणनीति में अयोध्या और आसपास के इलाकों के स्थानीय संत-महंत, कबीरपंथी और रैदासी परंपरा के अनुयायी, गाजीपुर-पूर्वांचल के सिद्धपीठों से जुड़े लोग अहम भूमिका निभा सकते हैं। साथ ही ज्योतिष्पीठ और गोवर्धन पीठ की तरफ से मंदिर निर्माण प्रक्रिया पर पहले उठाए गए सवालों को भी सपा वक्त-वक्त पर हवा देती रही है, ताकि सवर्ण और प्रबुद्ध तबके का एक हिस्सा भाजपा से छिटक सके। इस पूरी रणनीति को असली धार अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे को लेकर सामने आए विवाद ने दी है। मंदिर के दान-चढ़ावे में गड़बड़ी और चोरी के आरोपों की जांच एसआईटी कर रही है, और विपक्ष इसे आस्था के नाम पर हुई वित्तीय अनियमितता बताकर सरकार को घेर रहा है। स्थानीय दुकानदारों के विस्थापन का मुद्दा भी इससे जुड़ गया है। सपा के लिए अयोध्या अब बचाव की नहीं बल्कि हमले की जमीन बन चुकी है, वहीं भाजपा इसके जवाब में अयोध्या के वैश्विक स्तर के विकास और सुंदरीकरण को अपनी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है।

दूसरी तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी अपने तेवर नरम नहीं होने दिए हैं। हाल ही में प्रतापगढ़ पहुंचे सीएम योगी ने करीब 384 करोड़ रुपये की 111 विकास परियोजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण किया, साथ ही बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा में 593 अंकों के साथ टॉप करने वाली स्थानीय छात्रा श्रद्धा पांडे को मंच पर सम्मानित कर आईपैड भेंट किया। जनसभा में उन्होंने वक्फ बोर्ड की जमीनों को लेकर विपक्ष पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि गरीबों के हक की हजारों हेक्टेयर जमीन वक्फ के नाम पर बेची गई, लेकिन कांग्रेस और सपा ने कभी इस पर सवाल नहीं उठाया। मंदिर चढ़ावे की जांच पर उन्होंने भरोसा जताया कि एसआईटी सच सामने लाकर रहेगी और दोषियों पर पहले ही कार्रवाई हो चुकी है।योगी आदित्यनाथ ने सपा और कांग्रेस को घेरते हुए यह भी याद दिलाया कि जब राम मंदिर आंदोलन चरम पर था, तब कारसेवकों पर गोली चलाने का समर्थन करने वाले लोग आज सिर्फ चुनावी फायदे के लिए धार्मिक आस्था की बात कर रहे हैं। भाजपा नेतृत्व लखनऊ के शक्ति केंद्र संयोजक सम्मेलन के जरिए पहले ही यह संकेत दे चुका है कि पार्टी विकास और हिंदुत्व के अपने मूल एजेंडे से पीछे नहीं हटेगी।

इस बीच एक तीसरा कोण भी उभर आया है। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी बहराइच से चुनावी शंखनाद कर चुके हैं और मुस्लिम राजनीति के खाली मैदान पर अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। सपा का सॉफ्ट हिंदुत्व की तरफ झुकाव ओवैसी को यह मौका दे रहा है कि वे खुद को मुस्लिम समुदाय के वैकल्पिक राजनीतिक चेहरे के तौर पर पेश करें, जिससे अखिलेश की राह और जटिल हो सकती है। कुल मिलाकर 2027 का मुकाबला अब सिर्फ जातीय समीकरणों तक सीमित नहीं रह गया है। एक तरफ भाजपा विकास और कड़े हिंदुत्व की धार के साथ मैदान में है, तो दूसरी तरफ सपा पीडीए, सामाजिक न्याय और धार्मिक-सांस्कृतिक स्वीकार्यता का मिश्रण तैयार कर रही है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अगर सपा हिंदू मतदाताओं के एक हिस्से को साधने में कामयाब रहती है तो भाजपा के लिए यह चुनाव पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकता है, जबकि दूसरा पक्ष यह भी कहता है कि हिंदुत्व के मुद्दे पर भाजपा की वैचारिक पकड़ अब भी बहुत मजबूत है और सिर्फ धार्मिक प्रतीकों के सहारे उसे चुनौती देना आसान नहीं होगा। यह प्रयोग आखिरकार कितना असरदार साबित होता है, इसका जवाब तो जनता 2027 में मतदान के दिन ही देगी।

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