और इस तरह हुआ बंगाल में तृणमूल सरकार का पतन
(पूरन चन्द्र शर्मा)
पश्चिम बंगाल का जनादेश आ चुका है। मतगणना के बाद साफ हो गया कि बंगाल की जनता ने इस बार परंपरा तोड़ दी है। 2011 से लगातार सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस के सामने अब अस्तित्व का संकट है, जबकि भारतीय जनता पार्टी पर जनता ने बड़ा जोखिम लेकर भरोसा जताया है। बंगाल के लोगों ने इस बार केवल सरकार बदलने का फैसला नहीं लिया है उन्होंने उस राजनीतिक संस्कृति को भी नकारा है जहां बयानबाजी,तानाशाही और गुंडागर्दी शासन पर भारी पड़ रही थी और तुष्टिकरण विकास की जगह ले रहा था।
इन चुनाव परिणामों की नींव मतदान से महीनों पहले ही पड़ चुकी थी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सहित टीएमसी के वरिष्ठ नेताओं के लगातार गैर-जिम्मेदाराना बयानों ने बंगाल की जनता में गहरा असंतोष पैदा किया।
तृणमूल कांग्रेस तब विवादों के घेरे में आ गई जब मंत्री और वरिष्ठ नेता फिरहाद हकीम ने कोलकाता में एक अखिल भारतीय कुरान प्रतियोगिता के मंच से कहा, “जो लोग इस्लाम में पैदा नहीं हुए हैं वे दुर्भाग्यशाली हैं” और “इस धर्म को गैर-मुसलमानों के बीच फैलाया जाना चाहिए।” एक संवैधानिक पद पर बैठे नेता का यह वक्तव्य बंगाल की साझा संस्कृति के विरुद्ध था। दुर्गापूजा और ईद साथ मनाने वाले बंगाल में हिंदू बंगाली समाज ने इसे अपनी अस्मिता पर चोट माना। नाराजगी स्वाभाविक थी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस आग में घी डाला। एक सभा में उन्होंने कहा, “हम हैं इसलिए आप सब सुरक्षित हैं। अगर हम नहीं रहे, तो एक सेकंड में 12 बजा दिए जाएंगे।” यह बयान एक विशेष समुदाय को संबोधित करते हुए देखा गया। इसका सीधा संदेश यह गया कि बहुसंख्यक हिंदू समाज की सुरक्षा सत्ता की कृपा पर निर्भर है। नतीजा यह हुआ कि हिंदू बंगालियों में असुरक्षा की भावना घर कर गई।
पश्चिम बंगाल के फालता में टीएमसी नेता जहांगीर खान और चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त यूपी कैडर के आईपीएस अफसर अजय पाल शर्मा के बीच हुई तकरार ने प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए। मतदाताओं को डराने की शिकायत पर जब अजय पाल शर्मा टीएमसी नेता के घर पहुंचे तो जवाब मिला, “अगर अफसर ‘सिंघम’ हैं, तो हम ‘पुष्पा’ हैं, झुकेगा नहीं। हम भाजपा के अफसरों से नहीं डरेंगे।”
एक कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी से इस तरह का अशोभनीय व्यवहार और उसे ‘भाजपा का अफसर’ कहकर खारिज करना बंगाल के ‘भद्र मानुष’ को रास नहीं आया। अपनी करतूतों को नजरअंदाज कर उल्टे कानून के रखवाले को धमकाना जनता ने गुंडागर्दी की खुली छूट माना। कानून-व्यवस्था पहले से ही बड़ा मुद्दा थी, इस घटना ने उसे और धार दे दी।
वोटिंग से ठीक पहले टीएमसी के वरिष्ठ नेता और सांसद अभिषेक बनर्जी ने भारत के गृह मंत्री अमित शाह को खुली चुनौती दे डाली। उन्होंने कहा, “अगर आपमें हिम्मत है तो मतगणना वाले दिन कोलकाता में रहिएगा, फिर हम देखेंगे।” वे ममता बनर्जी की चौथी बार सरकार बनने को लेकर आश्वस्त दिखे, पर ‘खेला’ उल्टा हो गया।
अभिषेक बनर्जी के अभद्र बयान से बंगवासी नाराज हो गए। चुनाव के बीच संवैधानिक पद पर बैठे केंद्रीय मंत्री को इस भाषा में ललकारना मर्यादा का उल्लंघन था। जनता ने इसे अहंकार माना। इसी कड़ी में अनुव्रत मंडल जैसे नेताओं की ‘बाहुबली’ छवि और उनके विवादित बयानों ने भी टीएमसी की छवि को नुकसान पहुंचाया। कुल मिलाकर जनता के बीच यही संदेश गया कि सत्ता सेवा नहीं, धमकी का औजार है।
ममता बनर्जी ने इस बार भी बंगाल की जनता को भावनात्मक रूप से जोड़ने की भरपूर कोशिश की, पर सफल नहीं हो सकीं। वे एसआईआर, झालमुड़ी, ‘बाहिरागत’ यानी बाहरी लोग, केंद्रीय बलों की तैनाती, बात-बात पर न्यायालय का दरवाजा खटखटाना और वहां से फटकार मिलना, चुनाव आयोग को कोसना जैसी फिजूल की बातों में उलझी रहीं।
दूसरी ओर, बीजेपी ने राज्य में व्याप्त असली समस्याओं को जनमानस के समक्ष रखा। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, नारी सुरक्षा का अभाव, हिंसा, भू-माफिया का उत्पात, कटमनी, तोला बाजी-रंगदारी, तुष्टिकरण की नीति और सिंडिकेट राज,इन सभी मुद्दों पर बीजेपी ने सीधा संवाद किया और समाधान का वादा किया।
पश्चिम बंगाल की जनता को राज्य में सुशासन का सपना पूरा होते नहीं दिखा। बंगाल के भद्र लोगों ने टीएमसी से नाता तोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया। बंगवासी कई सालों से इन समस्याओं से मुक्ति पाने के बारे में सोच रहे थे। आज उन्हें बेहतर विकल्प के रूप में भारतीय जनता पार्टी मिल गई।
यह नहीं कि ममता सरकार ने काम नहीं किया। लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री, रूपश्री, स्वास्थ्य साथी, स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड जैसी योजनाओं ने लाखों परिवारों को सीधा लाभ पहुंचाया। फिर भी हिंदू बंगाली भाइयों-बहनों ने इन योजनाओं को ठुकराकर अपनी अस्मिता एवं सुरक्षा को प्राथमिकता दी।
संदेशखाली में महिलाओं पर हुए अत्याचार और आरजी कर मेडिकल कॉलेज की छात्रा पर हुए अमानवीय अत्याचार ने समाज को झकझोर दिया। अब बंगाल के भद्र मानुष को आशा है कि ऐसे दरिंदों को कठोर से कठोर सजा मिले।
इस बार के चुनाव में बंगाल की जनता ने लगातार एक ही सरकार को लंबे समय तक बिठाए रखने वाली परंपरा को तोड़ दिया है। 34 साल वाम मोर्चा और 15 साल टीएमसी के बाद जनता ने बता दिया कि सत्ता का लाइसेंस स्थायी नहीं होता। अब ‘बंगवासी’ को भ्रष्टाचार मुक्त, हिंसा मुक्त, भू-माफिया मुक्त, कटमनी मुक्त, तोला बाज मुक्त, तुष्टिकरण से परे, सिंडिकेट राज मुक्त और अपराध मुक्त बंगाल चाहिए।
गौरतलब है कि बंगाल की जनता ने एक बड़ा जोखिम लेकर बीजेपी पर भरोसा किया है। यह ‘पॉजिटिव वोट’ से ज्यादा टीएमसी के खिलाफ ‘नेगेटिव वोट’ है। इसलिए बीजेपी की नई सरकार के लिए यह अग्नि परीक्षा है। उसे
पहले 100 दिन में तीन काम करने होंगे। पहला, संदेशखाली और आरजी कर कांड के दोषियों को फास्ट-ट्रैक कोर्ट से सजा दिलाकर महिला सुरक्षा पर जीरो टॉलरेंस साबित करना। दूसरा, सिंडिकेट राज, कटमनी और तोला बाजी खत्म कर पुलिस-प्रशासन को राजनीतिक दबाव से मुक्त करना। तीसरा, ‘बाहिरागत’ की बहस खत्म कर बंगाली अस्मिता और राष्ट्रवाद के बीच संतुलन बनाना।
अगर बीजेपी सत्ता को बदले का औजार बनाएगी तो जागा हुआ बंगाल उसे भी नहीं बख्शेगा। बंगाल का लोकतंत्र अब सरकार बनाना भी जानता है और उखाड़ना भी। ये परिणाम बता रहे हैं कि बयान से सरकार नहीं बचती, सुशासन से बचती है। जब नेता ‘12 बजा देंगे’ कहते हैं, ‘दुर्भाग्यशाली’ बताते हैं और अफसर को ‘पुष्पा’ की धमकी देते हैं तो जनता ‘खेला’ उल्टा कर देती है। बंगाल ने बता दिया है,कि उसे पहले सुरक्षा चाहिए, सम्मान चाहिए, फिर विकास। जो भी सरकार बनी है, उसे याद रखना होगा कि बंगाल का भद्र मानुष अब भावनाओं में नहीं बहता, वह हिसाब रखता है और अब यही नए बंगाल की इबारत है। (लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ पत्रकार हैं) *(विभूति फीचर्स)*
