पुण्यतिथि पर विशेष – अभी न होगा मेरा अंत
*डॉ. विवेकानंद उपाध्याय*
*वरिष्ठ स्तम्भकार, (देवरिया)*
हिन्दी कविता में जब भी मुक्ति की बात होगी, एक ही नाम सबसे पहले गूंजेगा – निराला। 15 अक्टूबर 1961 को सरस्वती का यह महाप्राण मौन हुआ था, पर मौन होकर भी वह कभी मौन नहीं हुआ, क्योंकि वह अपने जाने से बहुत पहले ही लिख गया था – अभी न होगा मेरा अंत।
यही एक पंक्ति निराला के पूरे जीवन का सार है, यही उसका घोषणा-पत्र है, यही उसकी आत्मकथा है। दुख ने उसे आजीवन घेरा, अभाव ने तोड़ा, अपमान ने लहूलुहान किया, पत्नी मनोहरा का असमय जाना, पुत्री सरोज की मृत्यु जिसने उसे भीतर तक चीर दिया, दारागंज के एक छोटे से कमरे में फटे कुर्ते में भूख और उपेक्षा के साथ जीना, संपादकों-प्रकाशकों द्वारा तिरस्कार, समाज की निर्मम उपेक्षा, फिर भी वह हर बार राख से उठ खड़ा हुआ और कहता रहा – अभी न होगा मेरा अंत। यह जिद ही निराला है।
निराला को समझना हो तो उसकी रचनाओं की यात्रा से गुजरना होगा, क्योंकि उसकी हर रचना उसके जीवन का एक अध्याय है। जूही की कली से उसने हिन्दी में मुक्त छंद का पहला विस्फोट किया, पंडितों ने कहा यह कविता ही नहीं है, निराला हँसा और हिन्दी कविता सदा के लिए बंधन से मुक्त हो गई। अनामिका में उसका विद्रोही और प्रयोगधर्मी रूप अपने चरम पर है, जहाँ वह विधवा, भिक्षुक जैसी कालजयी कविताओं से छायावाद को कल्पना के आकाश से उतारकर धरती की पीड़ा से जोड़ देता है। परिमल भाषा की मुक्ति का घोषणापत्र है, जहाँ संस्कृत की गरिमा और बोलचाल की सहजता एक साथ साँस लेती है। गीतिका उन लोगों को जवाब है जो निराला को केवल विद्रोही समझते थे, यहाँ वह संगीत, राग और भक्ति के साथ सूर और तुलसी की परंपरा से जुड़ता है। तुलसीदास एक कवि के आत्मसंघर्ष को युग के सांस्कृतिक संघर्ष में बदलने वाला प्रबंधकाव्य है, तुलसी के बहाने वह अपने ही समय के अंधकार से लड़ने की जिद लिखता है। राम की शक्तिपूजा उसकी सर्वश्रेष्ठ रचना है, निराशा में डूबे राम के भीतर शक्ति की मौलिक कल्पना का जागरण, यह राम की नहीं हर पराजित मनुष्य के आत्मबल की कथा है, हिन्दी की लंबी कविता का शिखर। कुकुरमुत्ता में वह गुलाब और कुकुरमुत्ता के बहाने सामंतवाद पर सबसे तीखा व्यंग्य करता है और बताता है कि श्रम से कटी सुंदरता झूठी है। अणिमा और बेला जीवन के उत्तरार्ध का आत्ममंथन है, जहाँ विद्रोह शांत होकर भक्ति और करुणा में बदलता है पर स्वाभिमान नहीं छोड़ता। सरोज-स्मृति हिन्दी का सबसे करुण शोकगीत है, पुत्री की मृत्यु पर लिखा ऐसा विलाप जो व्यक्तिगत होकर भी पूरे समय का विलाप बन जाता है। लिली, सखी, चतुरी चमार, कुल्ली भाट, बिल्लेसुर बकरिहा जैसी गद्य रचनाओं में उसने हाशिए के लोगों को साहित्य का नायक बनाया, उसका गद्य कविता जितना ही बेबाक और चोट करने वाला है।
निराला का महत्व केवल रचनाओं की संख्या में नहीं है। उसने हिन्दी को दरबार से निकालकर सड़क, खेत और मजदूर की हथौड़ी तक पहुँचाया। उसकी भाषा में संस्कृत की गरिमा, बांग्ला की कोमलता, अवधी-भोजपुरी की मिठास और उर्दू की रवानी एक साथ घुली है। उसने जीवन भर समझौता नहीं किया, न सत्ता से, न बाजार से, न पुरस्कार से। वह भूखा रहा, उपेक्षित रहा, पागल कहा गया, पर झुका नहीं। इसीलिए वह जीवन भर अकेला रहा, पर अकेला होकर भी सबसे बड़ा रहा।
आज जब साहित्य बाजार में बिक रहा है और लेखक प्रचार में बँट गया है, निराला की पुण्यतिथि याद दिलाती है कि लेखक का धर्म बिकना नहीं, जलना है। उसे फूल-मालाओं से श्रद्धांजलि नहीं दी जा सकती, उसे उसकी कविताओं को फिर से पढ़कर और उसकी तरह सच बोलने का साहस जुटाकर ही सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है। वह मरा नहीं है, वह आज भी हिन्दी की हर मुक्त पंक्ति में, हर ईमानदार शब्द में साँस ले रहा है, क्योंकि उसने कह दिया था – अभी न होगा मेरा अंत, अभी-अभी ही तो आया है मेरे वन में मृदुल वसंत!
