कायमगंज/फर्रुखाबाद।
पितृपक्ष के पावन अवसर पर पूर्वजों की पुण्य स्मृति को समर्पित दिव्य सप्तदिवसीय श्रीमद्भागवत कथा में कथा व्यास श्री शिवानंद भाईश्री जी महाराज, नैमिषारण्य से पधारे, ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर उनकी बाल लीलाओं, माखन चोरी, राधा-कृष्ण के बाल माधुर्य तथा गोवर्धन लीला तक के प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया।

श्रीकृष्ण जन्म प्रसंग पर ब्रज में छाए आनंद का वर्णन करते हुए महाराजश्री ने कहा कि कृष्ण जन्म केवल उत्सव मनाने का विषय नहीं, बल्कि अपने आचरण में कृष्ण को उतारने का संदेश है। उन्होंने ‘यशोदा’ के भाव को समझाते हुए कहा कि जीवन में दूसरों को सम्मान, यश और प्रेम देना ही कृष्ण को अपने घर बुलाने जैसा है। नंद बाबा द्वारा कृष्ण जन्म के अवसर पर किए गए दान का प्रसंग सुनाते हुए श्रद्धालुओं को भी सामर्थ्य के अनुसार दान और सेवा के लिए प्रेरित किया।

महाराजश्री ने कहा कि मनुष्य को जीवन में दो बातों को सदैव स्मरण रखना चाहिए—परमात्मा और मृत्यु। धन, भवन, वाहन और सांसारिक वैभव यहीं रह जाते हैं; साथ जाता है तो केवल भगवान का नाम, पुण्य और किए गए सत्कर्म।
महादेव द्वारा बालकृष्ण के दर्शन की कथा के माध्यम से भगवान के प्रति भक्त की उत्कट लालसा का वर्णन किया गया। साथ ही कहा गया कि मनुष्य को अपनी आंखों और कानों को भी सत्संग का आहार देना चाहिए। सत्संग केवल बड़े आयोजनों में नहीं, बल्कि जहाँ भगवान, धर्म और सद्विचारों की चर्चा हो, वहीं हो सकता है।

पूतना प्रसंग में महाराजश्री ने ‘पूतना’ को अज्ञान और विकृत प्रवृत्तियों का प्रतीक बताते हुए धार्मिक जीवन में मर्यादा, श्रद्धा और शुद्ध भाव बनाए रखने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भगवान के सामने दिखावे की आवश्यकता नहीं, सच्चे भाव से किया गया समर्पण ही महत्वपूर्ण है।
कृष्ण की बाल लीलाओं में माखन चोरी के प्रसंग को आध्यात्मिक अर्थ देते हुए महाराजश्री ने कहा कि दूध का मंथन करने पर माखन उसका सार निकलता है और उसी प्रकार जीवन का सार प्रेम है। भगवान को प्रेम का ‘माखन’ प्रिय है। उन्होंने प्रेम और आकर्षण के अंतर को समझाते हुए कहा कि सच्चा प्रेम पूजा, उपासना और परमात्मा से जुड़ाव है।
राधा-कृष्ण की बाल लीलाओं के प्रसंगों ने कथा पंडाल को माधुर्य और आनंद से भर दिया। महाराजश्री ने समझाया कि भगवान ज्ञान से अधिक प्रेम और भाव के वश होते हैं। गोपियों की कृष्ण के प्रति शिकायतों के पीछे भी उनके गहरे प्रेम और कृष्ण-दर्शन की लालसा को दर्शाया गया।
इसके बाद गोवर्धन पूजा के प्रसंग में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और संरक्षण का संदेश दिया गया। महाराजश्री ने कहा कि प्रकृति पूजनीय है और उसकी रक्षा करना भी हमारा दायित्व है। पूजा में विवेकपूर्ण आचरण का आग्रह करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान को अर्पित सामग्री को व्यर्थ न जाने देकर उसका सदुपयोग किया जाना चाहिए।
इंद्र के अभिमान के प्रसंग से महाराजश्री ने विद्या, जाति, पद, रूप और भक्ति—इन पांच प्रकार के अभिमान से बचने का संदेश दिया। हनुमान जी और सुरसा के प्रसंग से उन्होंने कहा कि जीवन में बड़े कार्य कई बार विनम्र होकर ही पूरे होते हैं।
इंद्र के प्रकोप से ब्रजवासियों की रक्षा के लिए भगवान श्रीकृष्ण द्वारा सात वर्ष की आयु में अपनी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत धारण करने की लीला का वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं ने ‘गिरधर गोवर्धननाथ की जय’ के जयघोष किए।
कथा के दौरान महाराजश्री ने यह भी कहा कि धार्मिक आयोजन का वास्तविक उद्देश्य लोगों को भगवान और सत्संग से जोड़ना है। यदि किसी आयोजन के माध्यम से बड़ी संख्या में लोग एकत्र होकर भगवान का नाम सुनते और भक्ति से जुड़ते हैं, तो उस प्रयास का आध्यात्मिक महत्व है।
इस प्रकार कथा में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव से लेकर बाल लीलाओं और गोवर्धन धारण तक प्रेम, दान, सत्संग, विनम्रता, मर्यादा, प्रकृति संरक्षण और परमात्मा के प्रति समर्पण का संदेश दिया गया। कथा के अंत में अगले दिन होने वाले रुक्मिणी विवाह उत्सव की सूचना देते हुए श्रद्धालुओं से समय पर पहुंचने का आग्रह किया गया।

