पोषण: यह केवल हमारी थाली तक सीमित नहीं है
भारत की बदलती पोषण यात्रा पर ‘पोषण माह’ का एक दृष्टिकोण
प्रियंका जी. बंसल और अपर्णा मुखर्जी
आज आपने क्या खाया?
यह हमारे द्वारा पूछे जाने वाले सबसे आम सवालों में से एक है। हम इसे खाने की मेज पर पूछते हैं, फोन पर पूछते हैं, या बस बातचीत शुरू करने के लिए पूछते हैं। फिर भी इन कुछ शब्दों में एक ऐसा सवाल छिपा है जो हममें से हर किसी के लिए मायने रखता है: क्या हम अपने शरीर को वह सब दे रहे हैं जिसकी उसे बढ़ने, ठीक से काम करने और स्वस्थ रहने के लिए जरूरत है?
पोषण यह तय करता है कि एक बच्चा कैसे बढ़ता है, एक किशोर का विकास कैसे होता है, एक महिला गर्भावस्था का अनुभव कैसे करती है, एक वयस्क कैसे स्वस्थ रहता है और एक वृद्ध व्यक्ति कैसे सक्रिय रहता है। इस मायने में, पोषण केवल भोजन तक सीमित नहीं है। यह जीवन के हर पड़ाव में हमारे स्वास्थ्य की कहानी से जुड़ा हुआ है।
यही कारण है कि हर साल सितंबर में मनाया जाने वाला ‘पोषण माह’ केवल “स्वस्थ खाने” की वार्षिक याद दिलाने भर से कहीं अधिक है। यह रुककर एक बड़ा सवाल पूछने का अवसर है: जैसे-जैसे भारत के खान-पान की आदतें और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतें बदल रही हैं, क्या हमारे पोषण से जुड़े विकल्प भी उसी तालमेल से बदल रहे हैं?
भारत की पोषण यात्रा बदल रही है और यह और अधिक जटिल होती जा रही है। कुपोषण और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी आज भी गंभीर चिंताएं बनी हुई हैं, वहीं दूसरी ओर अधिक वजन, मोटापा और अन्य गैर-संचारी रोग (NCDs) तेजी से बढ़ रहे हैं। असल में, हम एक साथ पोषण की कमी, पोषण की अधिकता और कई बार गलत खान-पान- इन तीनों चुनौतियों का एक साथ सामना कर रहे हैं।
ऐसी स्थिति के लिए उतने ही व्यापक स्तर के प्रयासों की आवश्यकता है। सरकारी कार्यक्रम और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी पहल स्वास्थ्य के इन विभिन्न पहलुओं पर लगातार ध्यान दे रही हैं। उनका कार्य मोटापा और उच्च रक्तचाप जैसी गैर-संचारी बीमारियों की शुरुआती जांच और पहचान से लेकर स्वस्थ खान-पान के विकल्पों को बढ़ावा देने, अत्यधिक तेल की खपत घटाने और शारीरिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने तक फैला हुआ है। ‘ईट राइट इंडिया मूवमेंट’ और ‘खेलो इंडिया’ जैसी पहल एक सीधा लेकिन प्रभावशाली संदेश देती हैं: रोकथाम का मतलब केवल बीमारियों से बचना नहीं है, बल्कि एक स्वस्थ जीवन का निर्माण करना है।
प्रमाणों से कार्रवाई तक
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के लिए पोषण हमेशा से कार्य का एक प्रमुख केंद्र रहा है। अपने संस्थानों के नेटवर्क और अनुसंधान अनुदानों के माध्यम से, ICMR इस पूरी प्रक्रिया पर कार्य करता है: पोषण संबंधी समस्याओं और उनके कारणों को समझना, वैज्ञानिक प्रमाण जुटाना, वास्तविक जीवन में उपायों का परीक्षण करना, और इन निष्कर्षों को नीतियों और कार्यक्रमों में बदलना। इस कार्य में एनीमिया और बाल कुपोषण जैसी लंबे समय से चली आ रही चुनौतियों के साथ-साथ गट माइक्रोबायोम, न्यूट्रिजेनॉमिक्स, मेटाबोलोमिक्स, पोषण आकलन की नई तकनीकें और व्यक्तिगत स्वास्थ्य दृष्टिकोण जैसे आधुनिक विषय भी शामिल हैं।
अब वैज्ञानिक प्रमाणों को समाधानों में बदलने पर अधिक जोर दिया जा रहा है। इसका तात्पर्य ऐसे खाद्य एवं व्यवहार-आधारित तौर-तरीकों को विकसित और मूल्यांकित करना है जो वैज्ञानिक दृष्टि से सही हों, किफायती हों, स्वीकार्य हों और रोजमर्रा की जिंदगी में व्यावहारिक हों। अनुसंधान अब स्वास्थ्य क्षेत्र से आगे बढ़कर यह भी देख रहा है कि कृषि, खाद्य प्रणालियां और खान-पान के विकल्प मिलकर पोषण में सुधार और गैर-संचारी रोगों की रोकथाम में कैसे योगदान दे सकते हैं।
थाली में सतरंगी विविधता
इस पूरे विचार के केंद्र में एक सरल बात है: आहार में विविधता का होना आवश्यक है। एक स्वस्थ थाली का जटिल होना जरूरी नहीं है। इसे एक इंद्रधनुष की तरह समझें—अलग-अलग रंग, अलग-अलग खाद्य पदार्थ और सबसे महत्वपूर्ण, अलग-अलग पोषक तत्व। फल और सब्जियां, हरी पत्तेदार सब्जियां, साबुत अनाज और मोटे अनाज (मिलेट्स), दालें, मेवे और बीज, दूध या अन्य प्रोटीन के स्रोत-इन सभी का अपना स्थान है। उद्देश्य हर बार भोजन में एक ‘परफेक्ट’ थाली बनाना नहीं है, बल्कि पूरे दिन के खान-पान में विविधता लाना है।
इंद्रधनुषी थाली केवल एक सुंदर तस्वीर नहीं है। यह एक व्यावहारिक सीख देती है: कोई भी एक खाद्य पदार्थ हमारे शरीर की सभी जरूरतें पूरी नहीं कर सकता। भारत में विभिन्न क्षेत्रों के आधार पर अनाजों, दालों, सब्जियों, फलों, मेवों, बीजों और पारंपरिक व्यंजनों की समृद्ध विविधता पहले से मौजूद है। हमें हमेशा किसी नए “सुपरफूड” की तलाश करने की आवश्यकता नहीं है; कई बार हमें केवल अपनी भोजन परंपराओं में मौजूद विविधता को फिर से अपनाने की जरूरत होती है।
साथ ही, पोषण को “अच्छे” और “बुरे” भोजन के सांचे में बांटना सही नहीं है। भोजन की मात्रा, खाने की आवृत्ति, उसे पकाने का तरीका, पोषक तत्वों की संरचना और संपूर्ण आहार का स्वरूप—ये सभी चीजें मायने रखती हैं। कोई पारंपरिक भोजन सिर्फ इसलिए स्वास्थ्यवर्धक नहीं हो जाता क्योंकि वह पारंपरिक है, ठीक वैसे ही जैसे कोई पैकेज्ड भोजन केवल पैकेज्ड होने की वजह से नुकसानदेह नहीं हो जाता। सबसे महत्वपूर्ण बात संपूर्ण आहार का समग्र स्वरूप है।
दिखाई दे रहा है पोषण का बदलाव
एक और बदलाव ऐसा है जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है। अधिक वजन और मोटापे की बढ़ती दर यह दर्शाती है कि भारत के पोषण एजेंडे में पोषक तत्वों की कमी और अधिकता दोनों पर ध्यान देना क्यों जरूरी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के अलग-अलग चरणों के आंकड़े दिखाते हैं कि पुरुषों और महिलाओं दोनों में अधिक वजन और मोटापे का संयुक्त प्रसार लगातार बढ़ रहा है।
नोट: अधिक वजन/मोटापे को BMI ≥25 kg/m² के रूप में परिभाषित किया गया है। आंकड़े 15-49 वर्ष की आयु के वयस्कों के हैं।
स्रोत: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-3, 2005-06; NFHS-4, 2015-16; NFHS-5, 2019-21; NFHS-6, 2023-24)।
पोषण अनुसंधान के अगले चरण को अधिक एकीकृत और वास्तविक जीवन से गहराई से जुड़े होने की आवश्यकता होगी। हमें खान-पान के बदलते ढर्रे, संवेदनशील वर्गों और अस्वस्थ आहार के कारणों की बेहतर समझ विकसित करनी होगी। हमें यह जानना होगा कि क्या कारगर है, किसके लिए कारगर है, कहां कारगर है और किस स्तर पर कारगर है। कृषि, खाद्य प्रणाली, पोषण और स्वास्थ्य के बीच मजबूत संबंध, तकनीक और डेटा का बेहतर उपयोग, और खान-पान से जुड़ी बीमारियों की रोकथाम पर ध्यान देना इस नए चरण का मुख्य आधार होगा।
सबसे आवश्यक यह है कि हम पोषण संबंधी समस्याओं के केवल विवरण देने से आगे बढ़ें। असली अवसर इस बात में है कि हम इन समस्याओं का पहले से अनुमान लगाएं, उनसे बचाव करें और ऐसे समाधान तैयार करें जिन्हें लोग रोजमर्रा की जिंदगी में वास्तव में अपना सकें।
क्योंकि आखिरकार, पोषण का अर्थ किसी ‘परफेक्ट डाइट’ का पालन करना नहीं है। यह हमारे द्वारा हर भोजन के दौरान लिए जाने वाले हजारों सामान्य निर्णयों से जुड़ा है।
आज हमारी थाली में जो कुछ है, वह वास्तव में आने वाले कल के हमारे स्वास्थ्य की नींव है।
शायद ‘पोषण’ को समझने का यह सबसे सरल तरीका है-केवल जीवन में वर्षों को जोड़ना नहीं, बल्कि उन वर्षों में बेहतर स्वास्थ्य को जोड़ना।
(लेखक क्रमशः वैज्ञानिक ‘ई’, आईसीएमआर मुख्यालय, नई दिल्ली और वैज्ञानिक ‘एफ’ व प्रमुख, आरसीएन प्रभाग एवं क्लिनिकल ट्रायल्स यूनिट, आईसीएमआर मुख्यालय, नई दिल्ली हैं)

