Article : विश्वयुद्ध की दहलीज पर दुनिया,भारत के लिए अग्निपरीक्षा का समय

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विश्वयुद्ध की दहलीज पर दुनिया,भारत के लिए अग्निपरीक्षा का समय

■ ओंकारेश्वर पांडेय

इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि जब कूटनीति की मेज से आवाजें कम और आकाश में विमानों की गड़गड़ाहट ज्यादा होने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि युद्ध निकट है। और इस बार तो समंदर में भी भीषण तूफान उठ रहा है। दुनिया फिर विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। 27 फरवरी 2026 का दिन वैश्विक इतिहास में एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज हो गया है, जहाँ से वापसी का रास्ता धुंधला पड़ता जा रहा है। जब युद्ध के बादल गहराते हैं, तो सबसे पहले दूतावास खाली होते हैं और आसमान में लड़ाकू विमानों की कतारें दिखने लगती हैं। आज ठीक यही हो रहा है। अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी ने तेल अवीव से जो ‘एग्जिट ईमेल’ भेजा, वह केवल एक प्रशासनिक संदेश नहीं, बल्कि आने वाले महाविनाश का सायरन है। ईरान पर संभावित अमेरिकी हमले की आशंका ने बीजिंग से लेकर वाशिंगटन तक खलबली मचा दी है। उधर, दुनिया का सबसे बड़ा और आधुनिक युद्धपोत, ‘यूएसएस गेराल्ड आर.फोर्ड’, हैफा के तट पर लंगर डाल चुका है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अब “धमकी” का समय समाप्त हो चुका है और “कार्रवाई” की घड़ी आ गई है। एक भी चूक हुई तो केवल अमेरिका और ईरान ही नहीं बल्कि विश्व के अनेक देशों के इस युद्ध में कूदने और परमाणु युद्ध तक पहुंचने का खतरा है।

*युद्धाभ्यास से युद्ध की दहलीज तक*

बीते कुछ हफ्तों की समयरेखा को देखें तो स्पष्ट होता है कि स्थितियां हाथ से निकल चुकी हैं। विगत एक फरवरी 2026 को मास्को, बीजिंग और तेहरान के बीच हुए एक त्रिपक्षीय सामरिक समझौते ने पश्चिम की नींद उड़ा दी है। यह केवल रक्षा समझौता नहीं था, बल्कि रूसी राष्ट्रपति के सलाहकार निकोलाई पेत्रुशेव द्वारा परिकल्पित उस ‘बहुध्रुवीय विश्व’ की घोषणा थी, जो अमेरिकी वर्चस्व को सीधी चुनौती देने के लिए तैयार है।

43 पन्नों के इस समझौते के महज इतने ही बिंदु सामने आये हैं, जिसमें युद्ध होने की स्थिति में एक दूसरे को आर्थिक और संयुक्त राष्ट्र में राजनयिक सहयोग और समर्थन देने की बात की गयी है। पर दुनिया जानती है कि कड़ी बातें कहना वैसे ही होता है कि गरजने वाले बादल बरसते नहीं और खामोशी की गहराई समंदर से गहरी होती है। दुनिया की यह खामोशी ज्यादा खतरनाक है।

इसके तुरंत बाद 16 फरवरी 2026 को होर्मुज जलडमरूमध्य, जो दुनिया की ‘ऊर्जा लाइफलाइन’ है, वहां ‘मैरीटाइम सिक्योरिटी बेल्ट-2026’ अभ्यास शुरू हुआ। रूस और चीन के युद्धपोत ईरान के साथ मिलकर युद्धाभ्यास कर रहे हैं। यह महज कोई सैन्य अभ्यास नहीं है, बल्कि उस भू-राजनीतिक विस्फोटक का अंतिम फ्यूज है, जिसे सुलगाने की तैयारी लंबे समय से चल रही थी। यह संदेश साफ है कि अगर फारस की खाड़ी में युद्ध हुआ, तो ईरान अकेला नहीं होगा।

सवाल अब यह नहीं रह गया है कि धमाका होगा या नहीं,अब सवाल यह है कि इस महायुद्ध की पहली चिंगारी कहाँ गिरेगी और क्या कोई ऐसी शक्ति शेष है जो दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की भट्ठी में झोंकने से बचा सके?

19 फरवरी 2026 को राष्ट्रपति ट्रंप का अल्टीमेटम आया कि ईरान के पास केवल 10 से 15 दिन हैं। उनकी भाषा स्पष्ट थी, “या तो डील करो, या तबाही के लिए तैयार रहो।” ईरान समझौते के लिए तो तैयार है, पर अमेरिका जो शर्तें रख रहा है, वह मानने को तैयार नहीं।

*परमाणु गतिरोध: वियना वार्ता का ‘डेड एंड’*

और इसीलिए 26-27 फरवरी 2026 को जिनेवा में अंतिम दौर की वार्ता बेनतीजा रही। जिनेवा में चली पांच घंटे की मैराथन बैठक के बाद आधिकारिक तौर पर तो ओमान ने इसे प्रगति बताया, लेकिन पर्दे के पीछे की हकीकत यह है कि ईरान ने अपनी संप्रभुता और परमाणु अधिकारों के साथ समझौता करने से मना कर दिया है। यानी कोई ठोस परिणाम नहीं निकला।

अमेरिका चाहता है कि ईरान अपनी तीन प्रमुख परमाणु सुविधाओं (फोर्डो, नतांज और अराक) को पूरी तरह नष्ट कर दे और समृद्ध यूरेनियम देश से बाहर भेज दे। लेकिन ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग्ची का तर्क अडिग है “परमाणु ऊर्जा हमारा अधिकार है, और हम प्रतिबंधों की बंदूक के साये में आत्मसमर्पण नहीं करेंगे।”

*फोर्ड की तैनाती: इजराइल बनेगा ‘लॉन्च पैड’?*

यूएसएस गेराल्ड आर.फोर्ड का इजराइल पहुँचना रणनीतिक रूप से एक ‘चेकमेट’ की चाल जैसा है। अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपने दो सबसे शक्तिशाली विमानवाहक पोतों को तैनात कर दिया है। यूएसएस अब्राहम लिंकन अरब सागर में है और फोर्ड अब हैफा में। सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि फोर्ड की उपस्थिति इजराइल को वह सुरक्षा कवच प्रदान करती है, जिसके बाद वह ईरान पर ‘प्री-एम्प्टिव’ यानी निवारक हमला कर सकता है। फोर्ड का अत्याधुनिक ‘एजिस’ मिसाइल डिफेंस सिस्टम इजराइली शहरों को ईरान की लंबी दूरी की मिसाइलों से बचाएगा, जबकि उसके डेक से उड़ने वाले F-35 विमान ईरान के परमाणु ठिकानों को जमींदोज करने की क्षमता रखते हैं।

ट्रंप के दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर की सक्रियता बताती है कि अमेरिका शायद खुद सामने न आकर इजराइल को आगे कर दे। लेकिन ईरान के सर्वोच्च नेता ने भी साफ कर दिया है कि यदि उनके देश पर एक भी मिसाइल गिरी, तो इजराइल का अस्तित्व इतिहास के पन्नों तक सीमित कर दिया जाएगा।

*ईरान से निकासी की भगदड़- कूटनीति की हार*

इतिहास बताता है कि जब सरकारें अपने नागरिकों को घर वापस बुलाने लगती हैं, तो यह मान लेना चाहिए कि खुफिया एजेंसियों को युद्ध की निश्चित तारीख पता चल चुकी है। 27 फरवरी को अमेरिकी दूतावास ने गैर-जरूरी कर्मचारियों को तुरंत इजराइल छोड़ने को कहा। राजदूत हकाबी के शब्द “आज ही चले जाइए” दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति की बेबसी और तैयारियों को बयां करते हैं। वहीं, चीन जो आमतौर पर बहुत सधी हुई प्रतिक्रिया देता है,उसने भी अपने नागरिकों को ईरान से “जल्द से जल्द” निकलने की सलाह देकर यह पुख्ता कर दिया है कि खाड़ी की आग बुझने वाली नहीं है।

ट्रंप की समयसीमा 4-5 मार्च को खत्म हो रही है। अगले हफ्ते वियना में होने वाली तकनीकी वार्ता शायद केवल एक औपचारिकता बनकर रह गई है। दुनिया के पास अब केवल कुछ ही दिन बचे हैं, जब हथियार बोलना शुरू कर देंगे क्योंकि इस बार कोई गीदड़भभकी नहीं दे रहा।

*फारस की खाड़ी में अभूतपूर्व सैन्य जमावड़ा*

अमेरिका ने मध्य पूर्व में हाल के दशकों का सबसे बड़ा नौसैनिक जमावड़ा खड़ा कर दिया है। इस वक्त फारस की खाड़ी और अरब सागर में कम से कम 16 अमेरिकी युद्धपोत तैनात हैं । इनमें दो परमाणु-संचालित विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन और यूएसएस जेराल्ड आर. फोर्ड शामिल हैं, जिनमें से हर एक करीब 70 लड़ाकू विमान ले जा सकता है । इनके साथ नौ विध्वंसक (डेस्ट्रॉयर) और तीन लिटोरल कॉम्बैट शिप भी हैं, जो टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों से लैस हैं ।

*हवा में ताकत और भी खतरनाक*

जॉर्डन के मुवाफ्फक सल्ती एयर बेस और सऊदी अरब के अल-खार्ज बेस पर एफ-35 स्टेल्थ फाइटर्स, ए-10सी अटैक विमान, एमक्यू-9 ड्रोन और तीन ई-11ए बैटलफील्ड एयरबोर्न कम्युनिकेशन नोड (BACN) तैनात किए गए हैं। यह संख्या जून 2025 के ऑपरेशन मिडनाइट हैमर से भी ज्यादा है ।

*कम नहीं है ईरान की भी तैयारी*

उसकी रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) के पास 1500 से ज्यादा छोटी, तेज रफ्तार हमला नौकाओं का ‘मॉस्किटो फ्लीट’ है, जो 110 नॉट्स की रफ्तार से दौड़ सकती हैं और संख्या के बल पर अमेरिकी रडार को धोखा दे सकती हैं । उनके पास नस्र, कौसर (25 किमी रेंज), ग़ादेर (200-300 किमी) और अबू महदी (1000 किमी से ज्यादा) जैसी एंटी-शिप मिसाइलें हैं, जो खाड़ी के उथले पानी (औसत गहराई 35-50 मीटर) से दागी जा सकती हैं । ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई पहले ही कह चुके हैं कि अमेरिकी युद्धपोत “समुद्र की तह में भेज दिए जाएंगे” ।

और अब जरा सोचिए अगर यह टकराव हुआ, तो क्या सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित रहेगा? नहीं, यह तो पूरे पश्चिम एशिया को आग में झोंक देगा। सबसे पहला और सीधा निशाना होगा होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया का 20 फीसदी तेल गुजरता है । ईरान ने पहले ही इसे बंद करने की धमकी दे रखी है। एक बार यह रास्ता बंद हुआ, तो वैश्विक तेल कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल के पार जाएंगी और दुनिया की अर्थव्यवस्था ठप हो जाएगी। इस क्षेत्र में तैनात अमेरिकी ठिकाने सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान बेस, अल-खार्ज, ओमान के डुकम एयरपोर्ट, जॉर्डन के मुवाफ्फक सल्ती, कतर के अल-उदीद,सभी ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोनों की जद में हैं । इन ठिकानों से जुड़े सभी नागरिक एयरपोर्ट,दुबई, अबू धाबी, दोहा, मनामा, कुवैत सिटी, रियाद तुरंत बंद करने होंगे, क्योंकि कोई भी यह जोखिम नहीं लेगा कि एक भी यात्री विमान गलती से भी मिसाइल हमले की चपेट में आ जाए। इजरायल चाहे भले ही सीधे खाड़ी में न हो, लेकिन नेतन्याहू लगातार ईरान की मिसाइलों को खत्म करने की मांग कर रहे हैं। अगर ईरान पर हमला हुआ, तो तेल अवीव उसकी पहली जवाबी कार्रवाई का निशाना बनेगा । हिज्बुल्लाह (लेबनान), हूती (यमन), और शिया मिलिशिया (इराक, सीरिया) सभी एक साथ अमेरिकी और इजरायली ठिकानों पर हमला करेंगे। यह कोई द्विपक्षीय झड़प नहीं होगी,यह पूरे पश्चिम एशिया को जलाने वाली आग होगी, जिसमें रूस, चीन, यूरोप और भारत को भी अपनी-अपनी सुरक्षा और तेल आपूर्ति बचाने के लिए कूदना पड़ेगा और तब आप देखेंगे कि इस युद्ध को विश्व युद्ध में बदलने में देर नहीं लगेगी।

*वैश्विक महाशक्तियों के बीच भारत की अग्निपरीक्षा*

रूस और चीन के लिए खाड़ी का यह संकट एक अवसर की तरह है। वे चाहते हैं कि अमेरिका इस क्षेत्र में उलझा रहे ताकि यूक्रेन और ताइवान पर दबाव कम हो सके लेकिन भारत के लिए यह स्थिति किसी दुस्वप्न से कम नहीं है। भारत को 2026 में ब्रिक्स (BRICS) की अध्यक्षता ।करनी है, जहाँ ईरान अब एक पूर्ण सदस्य है। दूसरी ओर, क्वाड (QUAD) के साथी अमेरिका ने भारत पर दबाव बनाया है कि वह चाबहार पोर्ट का संचालन बंद करे। भारत ने इस प्रोजेक्ट को फिलहाल स्थगित कर रखा है। चाबहार न केवल भारत का रणनीतिक निवेश है, बल्कि मध्य एशिया तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता भी है। यदि युद्ध छिड़ता है, तो कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर के पार जा सकती हैं, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती पैदा होगी।

*ट्रंप के विकल्प : विनाश या शांति*

राष्ट्रपति ट्रंप के सामने अब तीन रास्ते हैं, और तीनों ही जोखिम से भरे हैं। यदि वे समझौता करते हैं, तो उनकी छवि एक ‘कमजोर नेता’ की बनेगी। यदि वे पीछे हटते हैं, तो यह अमेरिका के सैन्य सम्मान की ऐतिहासिक हार होगी। और यदि वे युद्ध का चुनाव करते हैं, तो यह एक अंतहीन विनाश का सिलसिला होगा जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को दशकों पीछे धकेल देगा।

होर्मुज की लहरें इस समय शांत जरूर हैं, लेकिन उनके भीतर एक ज्वालामुखी सुलग रहा है। ईरान, रूस और चीन की मैरीटाइम बेल्ट ने पश्चिमी देशों के लिए एक अभेद्य दीवार खड़ी कर दी है। क्या दुनिया 1914 और 1939 की गलतियों को दोहराने जा रही है? फारस की खाड़ी की तपती रेत पर आज जो इबारत लिखी जा रही है, वह केवल खाड़ी का भविष्य नहीं, बल्कि पूरी मानवता का भाग्य तय करेगी। अगर कूटनीति इस हफ्ते हार गई, तो अगला हफ्ता बारूद की गंध और सायरनों की आवाज के बीच शुरू होगा। *(विनायक फीचर्स)*

*लेखक परिचय*

ओंकारेश्वर पांडेय एक प्रख्यात वरिष्ठ पत्रकार, अंतरराष्ट्रीय मामलों के रणनीतिक विश्लेषक और भारत के अग्रणी चुनाव रणनीतिकार हैं। राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर अपनी गहरी पैठ रखने वाले श्री पांडेय ‘गोल्डन सिग्नेचर’ (Golden Signatures) के संस्थापक और सीईओ हैं तथा ‘यूनेस्को मिल एलायंस’ (UNESCO MIL Alliance) के प्रतिष्ठित सदस्य हैं। वे विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum) के वैश्विक नेटवर्क का हिस्सा हैं। साथ ही संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) और ‘ग्लोबल फोरम फॉर सस्टेनेबल रूरल डेवलपमेंट’ के वैश्विक सलाहकार बोर्ड में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। पर्यावरण और महिला सशक्तिकरण के प्रति समर्पित, उन्होंने ‘ग्रीन प्लैनेट फोरम’ और ‘विमेन थॉट लीडर्स’ जैसे मंचों की स्थापना की है। वे ‘इलेक्ट्रो-पॉलिटिकल स्ट्रैटेजीज’ के मुख्य रणनीतिकार के रूप में भी विख्यात हैं। *(विनायक फीचर्स)*

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