फर्रुखाबाद |
जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला एक मामला सामने आया है। एक ओर सरकार आम जनता को बेहतर और निःशुल्क चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर लोहिया अस्पताल में तैनात एक संविदा हड्डी रोग विशेषज्ञ पर मरीज को सरकारी अस्पताल में इलाज न देकर निजी अस्पताल में भर्ती कराने और ऑपरेशन में गंभीर लापरवाही बरतने के आरोप लगे हैं।
मामला शहर के गंगा नगर निवासी महेश शर्मा का है, जो 29 मई को छत से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गए थे। घायल अवस्था में उनकी पत्नी आरती शर्मा उन्हें उपचार के लिए डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल लेकर पहुंचीं। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में तैनात संविदा हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. आयुष्मान सिंह ने सरकारी अस्पताल में ऑपरेशन करने से इनकार कर दिया और मरीज को अपने निजी अस्पताल में भर्ती कराने की सलाह दी।
परिवार का कहना है कि आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद मजबूरी में रिश्तेदारों और परिचितों से उधार लेकर 50 हजार रुपये की व्यवस्था की गई और मरीज का निजी अस्पताल में इलाज कराया गया। लेकिन ऑपरेशन के बाद जो तथ्य सामने आया, उसने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया।
परिजनों के अनुसार मरीज का एक कूल्हा टूटा हुआ था, लेकिन ऑपरेशन स्वस्थ कूल्हे का कर दिया गया। जब इस बात को लेकर परिवार ने आपत्ति जताई तो डॉक्टर ने अपनी गलती स्वीकार की और बाद में टूटे हुए कूल्हे का भी ऑपरेशन किया। इस घटना के बाद परिवार मानसिक, आर्थिक और शारीरिक रूप से परेशान है।
मरीज की पत्नी आरती शर्मा का आरोप है कि ऑपरेशन से संबंधित महत्वपूर्ण दस्तावेज, एक्स-रे रिपोर्ट और अन्य चिकित्सीय अभिलेख आज तक उन्हें उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। इससे पूरे मामले में संदेह और गहरा गया है।
यह मामला केवल एक मरीज या एक परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। यदि सरकारी अस्पताल में तैनात चिकित्सक मरीजों को निजी संस्थानों की ओर भेज रहे हैं तो यह न केवल गरीब मरीजों के हितों के खिलाफ है, बल्कि सरकारी संसाधनों, चिकित्सा सुविधाओं और जनता के टैक्स से संचालित स्वास्थ्य व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह चिकित्सा लापरवाही के साथ-साथ सरकारी दायित्वों के उल्लंघन का भी गंभीर मामला है। ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होना आवश्यक है ताकि भविष्य में किसी अन्य मरीज को ऐसी परिस्थितियों का सामना न करना पड़े।
पीड़ित परिवार ने जिलाधिकारी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी और स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों को शिकायत देकर मामले की निष्पक्ष जांच, चिकित्सा अभिलेखों की उपलब्धता तथा दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
अब सभी की निगाहें प्रशासनिक जांच पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस मामले में कितनी गंभीरता दिखाता है और क्या जनता के भरोसे तथा सरकारी धन से संचालित स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं।
