तबादला आदेश बेअसर! रेंज से बाहर स्थानांतरण के बाद भी पुराने जिलों में जमे पुलिसकर्मी, उठे भ्रष्टाचार के सवाल
शासन के आदेशों को चुनौती या सिस्टम में साठगांठ? स्थानांतरण नीति की धज्जियां उड़ने से सुशासन पर सवाल
तबादला कहीं, ड्यूटी कहीं! यूपी
पुलिस में आदेशों को ठेंगा”
“वभाग में तबादला नीति पर सवाल”
“किसके संरक्षण में जमे हैं पुलिसकर्मी? तबादला आदेशों की खुली अवहेलना”
यूपी पुलिस में ट्रांसफर खेल: आदेश जारी, लेकिन कर्मचारी पुराने जिले में बरकरार”
राम प्रसाद माथुर
उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग में स्थानांतरण नीति की खुली अनदेखी का मामला लगातार चर्चा में है। शासन द्वारा जनपदों और रेंज से बाहर तबादले किए जाने के बावजूद कई पुलिसकर्मी महीनों से पुराने तैनाती स्थलों पर ही जमे हुए हैं। ऐसे मामलों ने पुलिस महकमे में व्याप्त कथित भ्रष्टाचार, राजनीतिक संरक्षण और विभागीय साठगांठ पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
शासन का स्पष्ट निर्देश है कि स्थानांतरण आदेश जारी होने के बाद निर्धारित अवधि के भीतर संबंधित पुलिसकर्मी को कार्यमुक्त कर नई तैनाती पर कार्यभार ग्रहण करना चाहिए। लेकिन हकीकत यह है कि कई पुलिसकर्मी आदेशों के बावजूद पुराने जिले या रेंज में ही डटे हुए हैं। सूत्रों का दावा है कि कुछ मामलों में प्रभावशाली पहुंच, राजनीतिक दबाव और कथित आर्थिक लेन-देन के चलते तबादला आदेशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
पुलिस विभाग में लंबे समय तक एक ही स्थान पर तैनाती को भ्रष्टाचार की जड़ माना जाता है। स्थानीय स्तर पर मजबूत नेटवर्क बनने से अवैध वसूली, प्रभाव का दुरुपयोग और संवेदनशील मामलों में पक्षपात की आशंकाएं बढ़ जाती हैं। यही वजह है कि समय-समय पर स्थानांतरण नीति लागू की जाती है, ताकि किसी भी कर्मचारी की एक स्थान पर पकड़ न बन सके। लेकिन जब स्थानांतरण आदेशों का ही पालन नहीं होता तो पूरी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सूत्र बताते हैं कि कई पुलिसकर्मियों के तबादले दूसरे जनपदों में हो चुके हैं, फिर भी वे किसी न किसी बहाने से कार्यमुक्त नहीं हो रहे। कुछ मामलों में विभागीय अधिकारियों की चुप्पी भी संदेह पैदा कर रही है। सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसे कर्मचारियों को संरक्षण कौन दे रहा है और शासन के आदेशों का अनुपालन सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी किसकी है?
पुलिस महकमे के जानकारों का मानना है कि यदि तबादला आदेशों की अवहेलना करने वालों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो यह संदेश जाएगा कि नियम केवल कागजों तक सीमित हैं। इससे ईमानदार और नियमों का पालन करने वाले पुलिसकर्मियों में भी असंतोष बढ़ सकता है।
जनता और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि शासन ऐसे मामलों की उच्चस्तरीय जांच कराए और यह पता लगाए कि आखिर तबादले के बाद भी कर्मचारी पुराने स्थानों पर कैसे जमे हुए हैं। साथ ही उन अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाए जिन्होंने आदेशों का पालन कराने में लापरवाही बरती।
सुशासन और पारदर्शिता के दावों के बीच उत्तर प्रदेश पुलिस में स्थानांतरण नीति की अनदेखी एक बड़ा सवाल बनकर उभरी है। अब देखना यह होगा कि शासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है या फिर तबादला आदेश यूं ही फाइलों में दबकर रह जाएंगे।
