*प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी.के. मिश्रा ने पुणे, महाराष्टमएनआईबीएमीएमीएम के 20वें वार्षिक दीक्षांत समारोह को संबोधित किया*
*ऋण आर्थिक कार्यों, आजीविका सृजन और नागरिकों के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण है: डॉ. पी.के. मिश्रा*
*डिजिटल भुगतान प्रणाली केवल एक तकनीक नहीं है; यह अनौपचारिकता और औपचारिक आर्थिक भागीदारी के बीच, रोक और अवसर के बीच, तथा गुमनामी और आर्थिक पहचान के बीच एक सेतु है: डॉ. पी.के. मिश्रा*
*दुनिया भर के देश अब भारत की डिजिटल सार्वजनिक प्रणाली का बड़ी रूचि से अध्ययन कर रहे हैं। भारत समावेशी डिजिटल वित्त पर वैश्विक सोच को आकार देने में मदद कर रहा है: डॉ. पी.के. मिश्रा*
*जन धन और आधार जैसे मूलभूत तत्वों पर दृढ़ता से आधारित ये बहुआयामी पहलें, सुदृढ़ नीति-निर्माण और प्रधानमंत्री की असाधारण मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की ही देन हैं: डॉ. पी.के. मिश्रा*
नई दिल्ली, 16, मई, 2026
प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव, डॉ. पी.के. मिश्रा ने आज पुणे, महाराष्ट्र में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बैंक मैनेजमेंट (एनआईबीएम) के 20वें वार्षिक दीक्षांत समारोह को संबोधित किया। उन्होंने इस समारोह में शामिल होकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए, 2024-26 बैच और स्वर्ण पदक विजेताओं को हार्दिक बधाई दी। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि स्नातक एक ऐसे महत्वपूर्ण दौर में पेशेवर दुनिया में कदम रख रहे हैं, जहाँ बैंकिंग का दायरा महज़ सामान्य व्यापार से कहीं आगे तक फैला हुआ है। डॉ. मिश्रा ने कहा, “दीक्षांत समारोह उपलब्धियों के पड़ाव होते हैं; लेकिन साथ ही ये बदलाव के क्षण भी होते हैं।”
डॉ. मिश्रा ने एक शीर्ष बैंकिंग थिंक-टैंक के रूप में एनआईबीएम की पाँच दशकों की विरासत पर विचार व्यक्त करते हुए संस्थागत उत्कृष्टता के महत्व के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि जहाँ पारंपरिक बैंकिंग का ध्यान केवल बचत जुटाने पर था, वहीं आज के दौर में राष्ट्रीय अवसरों पर व्यापक ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्होंने स्नातक होने वाले छात्रों से आग्रह किया कि वे इस बदलते हुए दायरे को आत्मसात करें। उन्होंने कहा, “आने वाले दिनों में, आपको बैंकिंग और वित्त को कहीं अधिक व्यापक अर्थ—समावेशन, अवसर, विश्वास और राष्ट्रीय विकास के रूप में देखना होगा।”
डॉ. मिश्रा ने पारंपरिक अर्थव्यवस्था पर चर्चा करते हुए समझाया कि वित्त ने ऐतिहासिक रूप से पृष्ठभूमि में रहकर एक मूक सहायक की भूमिका निभाई है। उन्होंने बताया कि वास्तविक अर्थव्यवस्था और वित्त के बीच के संबंधों को ठीक से समझा नहीं गया, जिसके कारण अक्सर कम सुविधा प्राप्त वर्ग औपचारिक संस्थागत सहयोग से वंचित रह गया। उन्होंने दोहराया कि ऋण की उपलब्धता में यह असंतुलन लोगों की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। उन्होंने कहा, “ऋण आर्थिक कार्यों, आजीविका सृजन और नागरिकों के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण है।”
डॉ. मिश्रा ने ग्रामीण ऋण असमानताओं पर चर्चा करते हुए विस्तार से बताया कि कैसे प्रारंभिक आर्थिक सिद्धांत अनौपचारिक साहूकारों के प्रभुत्व को दूर करने में विफल रहे। उन्होंने कहा कि एकाधिकार सिद्धांतों से लेकर प्रतिस्पर्धी बाजार मॉडलों तक विभिन्न दृष्टिकोण गरीबों को सस्ते प्राथमिकता वाले ऋण नहीं दे सके। उन्होंने कहा, “1990 के दशक तक, अर्थशास्त्रियों ने महसूस किया कि कोई भी दृष्टिकोण वास्तविकताओं को पूरी तरह से स्पष्ट नहीं कर पाया, जैसे कि साहूकार संस्थागत विकल्पों के उपलब्ध होने के बावजूद भी अत्यधिक ब्याज दरें वसूलते थे।”
डॉ. मिश्रा ने अपने 1990 के दशक के शोध से प्राप्त जानकारियों को साझा करते हुए समझाया कि सूचना की समान जानकारी न होने और नीतियों को लागू करने संबंधी समस्याओं के कारण ऐतिहासिक रूप से औपचारिक ग्रामीण ऋण महंगा और रहन पर अत्यधिक निर्भर रहा है। उन्होंने कहा कि हालांकि प्रौद्योगिकी ने इस व्यवस्थागत कठिनाई को काफी हद तक हल कर दिया है। उन्होंने टिप्पणी की, “प्रौद्योगिकी के आधुनिक प्रयोग ने सूचना संबंधी लागतों को काफी कम कर दिया है, जिससे ऐतिहासिक बाजार विषमताओं को प्रभावी ढंग से कम किया जा सका है।”
डॉ. मिश्रा ने ज़ोर देकर कहा कि वित्त को डिजिटल पहचान और मोबाइल कनेक्टिविटी के साथ जोड़ने से, बड़े पैमाने पर लोगों तक पहुँचने में आने वाली पुरानी रुकावटें दूर हुई हैं। उन्होंने जन धन, आधार और मोबाइल एवं प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण प्रणाली के बारे में बताया और कहा कि इनके माध्यम से 50 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि हस्तांतरित की गई है, और साथ ही व्यवस्था के कामकाज में 4 लाख करोड़ रुपये की बचत भी हुई है। उन्होंने इन माध्यमों को आर्थिक पहचान बनाने का एक आधारभूत माध्यम बताया। उन्होंने कहा, “डिजिटल भुगतान प्रणाली केवल एक तकनीक नहीं है। डिजिटल भुगतान प्रणाली केवल एक तकनीक नहीं है; यह अनौपचारिकता और औपचारिक आर्थिक भागीदारी के बीच, रोक और अवसर के बीच, तथा गुमनामी और आर्थिक पहचान के बीच एक सेतु है।”
यूनिफ़ाइड पेमेंट्स इंटरफ़ेस को लोकतंत्रीकरण का एक बेहतरीन उदाहरण बताते हुए, डॉ. मिश्रा ने बताया कि इससे प्रति वर्ष लेन-देन बढ़कर 24,000 करोड़ से अधिक हो गया है। उन्होंने आगे कहा कि यह बड़े पैमाने पर काम करने वाला अंत: परिचालनात्मक प्रणाली आवश्यक डेटा रिकॉर्ड तैयार करता है जिससे उन लोगों को भी अपनी साख बनाने का मौका मिलता है जिनके पास ऋण के बदले रहन के लिए कुछ नहीं होता है। उन्होंने बताया कि तकनीक इस धारणा को बदल रही है कि कौन लोग वित्तीय सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं। उन्होंने कहा, “दुनिया भर के देश अब भारत के डिजिटल सार्वजनिक प्रणाली का बड़ी रूचि से अध्ययन कर रहे हैं। भारत, समावेशी डिजिटल वित्त के बारे में वैश्विक सोच को आकार दे रहा है।”
डॉ. मिश्रा ने आगे ज़ोर दिया कि यह वित्तीय समावेशन प्रधानमंत्री मुद्रा योजना जैसी योजनाओं के माध्यम से आर्थिक अवसरों में बदले। इस योजना के तहत 40 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि स्वीकृत की गई है। उन्होंने बताया कि पीएम स्वनिधि और पीएम विश्वकर्मा जैसे कार्यक्रम हाशिए पर पड़े कारीगरों के लिए उनकी आवश्यकताओं के अनुसार विकास सुनिश्चित करते हैं, और उन्हें शोषणकारी अनौपचारिक ऋण से मुक्ति दिलाते हैं। उन्होंने कहा कि यदि उद्यमिता पर रोक लगा दी जाए, तो कोई भी समाज अपनी पूरी क्षमता प्राप्त नहीं कर सकता है। उन्होंने कहा, “जन धन और आधार जैसे मूलभूत तत्वों पर दृढ़ता से आधारित ये बहुआयामी पहलें, सुदृढ़ नीति-निर्माण और प्रधानमंत्री की असाधारण मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की ही देन हैं।”
डॉ. मिश्रा ने वित्त को सामाजिक सुरक्षा के साथ जोड़ते हुए आयुष्मान भारत और प्रधानमंत्री की विभिन्न पेंशन योजनाओं को चिकित्सा या फ़सल खराब होने जैसी स्थितियों से निपटने की क्षमता विकसित करने के लिए बेहद ज़रूरी बताया। उन्होंने समझाया कि वित्त को सामाजिक सुरक्षा के साथ जोड़ने से यह सुनिश्चित हुआ कि वित्तीय पहुँच दीर्घकालिक विकास में सहायक हो। हालाँकि, उन्होंने यह भी आगाह किया कि अगले चरण में हमें केवल पहुँच तक ही सीमित न रहकर, निरंतर आर्थिक भागीदारी की दिशा में आगे बढ़ना होगा। उन्होंने ज़ोर देकर कहा, “इसलिए, वित्तीय मज़बूती—यानी किसी परिवार की बिना बिखरे मुश्किलों का सामना करने की क्षमता—कोई मामूली या गौण मुद्दा नहीं है।”
डॉ. मिश्रा ने भविष्य की ओर देखते हुए चेतावनी दी कि आधुनिक वित्तीय प्रणालियों को एमएसएमई, किसानों और महिलाओं के नेतृत्व वाले उद्यमों की विश्वसनीय सेवा करने के लिए वास्तविक अर्थव्यवस्था से जुड़ा रहना होगा। उन्होंने आगाह किया कि एआई और साइबर खतरों के इस दौर में, तकनीकी नवाचार को नैतिक ज़िम्मेदारी और जन-विश्वास के साथ संतुलित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि वित्त को जवाबदेही के साथ-साथ नैतिक सिद्धांतों को भी अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि “वित्त का महत्व तब है, जब वह समाज की उत्पादक क्षमता को मज़बूत करता है, न कि उससे अलग हो जाता है।”
डॉ. मिश्रा ने युवा स्नातकों को सीधे संबोधित करते हुए उनसे आग्रह किया कि वे अपने कॉर्पोरेट करियर में एक व्यापक जन-उद्देश्य को साथ लेकर चलें। उन्होंने उनसे समावेशी संस्थानों के सक्रिय निर्माता बनने और बैंकिंग प्रणाली की अखंडता की रक्षा करने वाले दृढ़ संरक्षक बनने का आग्रह किया। उन्होंने उन्हें एक समृद्ध भारत के निर्माण में सहायता करने के लिए, प्रत्येक डिजिटल लेन-देन के पीछे छिपे मानवीय पहलू को याद रखने के लिए प्रोत्साहित किया। डॉ. मिश्रा ने ज़ोर देकर कहा, “सबसे बेहतरीन वित्तीय पेशेवर वे होते हैं, जो तकनीकी उत्कृष्टता को मानवीय समझ के साथ जोड़ते हैं।”
इस अवसर पर भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर श्री संजय मल्होत्रा, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ बैंक मैनेजमेंट के निदेशक प्रो. पार्थ रे, वरिष्ठ संकाय सदस्य, अर्थशास्त्री और बैंकर उपस्थित थे।
