Article : सरहदों की दीवारों में सिसकती संवेदनाएं

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सरहदों की दीवारों में सिसकती संवेदनाएं

(विवेक रंजन श्रीवास्तव)

मनुष्य का समूचा इतिहास वस्तुतः उसकी निरंतर गति और अदम्य जिज्ञासा का ही इतिहास है। पुरातन काल के उस आदिम मनुष्य की कल्पना कीजिए, जिसकी आँखों में पूरा आकाश समाया था और जिसके पाँव किसी कृत्रिम सीमा को नहीं पहचानते थे। तब धरती माँ थी, और उसका असीम विस्तार ही ‘घर’ था। कबीले चलते थे, सभ्यताएँ प्रवास करती थीं और संस्कृतियाँ किसी अविरल बहती नदी की तरह एक-दूसरे में विलीन हो जाती थीं। तब न देशों के बीच कोई कँटीली बाड़ थी, न कोई पासपोर्ट न ही वीजा । मनुष्य की पहचान उसके पदचिह्नों और उसके कर्म से थी, कागज़ के किसी बेजान टुकड़े से नहीं। वह ‘स्व’ और ‘पर’ के संकुचित बोध से मुक्त, प्रकृति का एक अभिन्न हिस्सा था।

समय का चक्र घूमा और मनुष्य ने प्रकृति की चुनौतियों को स्वीकार करना सीखा। जब उसने लकड़ी के लट्ठों को जोड़कर पानी पर तैरना सीखा, तो समुद्र की अगाध दूरियां छोटी पड़ने लगीं। वह अन्वेषण का युग था। वास्को-डि-गामा, कोलंबस और मैगेलन जैसे साहसी नाविकों ने केवल नए भूखंड ही नहीं खोजे, बल्कि विचारों और व्यापार के ऐसे सेतु बनाए जिन्होंने दुनिया का नक्शा बदल दिया। जहाज तब केवल मसाले, स्वर्ण या रेशम नहीं ढोते थे , वे अपने साथ दर्शन, कला और जीवन पद्धति , संस्कृति भी ले जाते थे। समुद्र ने देशों को जोड़ा, पर उसी जुड़ाव की कोख से साम्राज्यवाद की महत्वाकांक्षा ने भी जन्म लिया। ताक़तवर राष्ट्रों ने मानचित्रों पर अपनी लकीरें बढ़ानी शुरू कीं और यहीं से ‘अधिकार क्षेत्र’ की अवधारणा प्रबल हुई।

विज्ञान और तकनीक की उड़ान ने इस विस्तार को नई ऊँचाई दी। राइट ब्रदर्स के सपनों ने जब हवा में पंख फैलाए, तो बादलों के ऊपर से नीचे की सरहदें बौनी और अर्थहीन लगने लगीं। इंटरनेट आया तो लगा कि अब हम सचमुच एक ‘वैश्विक ग्राम’ (Global Village) के नागरिक बन गए हैं। सूचना क्रांति और इंटरनेट ने तो मानो भूगोल की दूरी बहुत बौनी ही कर दी । न्यूयॉर्क की हलचल मुंबई के स्क्रीन पर और बीजिंग का बाज़ार लंदन की गलियों में आ पहुँचा। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का प्राचीन भारतीय दर्शन आधुनिक तकनीक के चश्मे से यथार्थ जैसा दिखने लगा।

उदारवाद और वैश्वीकरण ने एक ऐसे भविष्य का सुनहरा स्वप्न दिखाया, जहाँ बाज़ार और मानवता दोनों एक साझी ज़मीन पर खड़े होंगे।

किंतु, इस भौतिक प्रगति के समानांतर एक विडंबना भी अत्यंत सूक्ष्मता से आकार ले रही थी। जैसे-जैसे हमारी संचार गति बढ़ी, हमारी मानसिक संकीर्णता के द्वार भी गहरे होते गए। जिस तकनीक ने हमें ‘ग्लोबल’ बनाया, उसी ने नियंत्रण की नई प्रणालियाँ भी विकसित कर दीं।

प्रथम विश्व युद्ध के बाद की दुनिया ने ‘पासपोर्ट’ और ‘वीज़ा’ जैसे शब्दों को सुरक्षा का कवच बनाया, पर अंततः ये हमारी नैसर्गिक स्वतंत्रता की बेड़ियाँ बन गए। आज मनुष्य एक चलती-फिरती धड़कन और स्वतंत्र चेतना बाद में है, पहले वह डेटा, बायोमेट्रिक्स और दस्तावेज़ों का एक बंडल है। हवाई अड्डों की लंबी कतारें और इमिग्रेशन काउंटरों पर होने वाली पूछताछ उस आधुनिक दासता की प्रतीक हैं, जहाँ आपकी गरिमा आपकी राष्ट्रीयता के ‘रैंक’ पर निर्भर करती है।

आज का दौर और भी चुनौतीपूर्ण और विरोधाभासी है। हम एक अजीबोगरीब द्वंद्व में जी रहे हैं। एक ओर हम मंगल और चंद्रमा पर बस्तियाँ बसाने की योजना बना रहे हैं, दूसरी ओर अपनी ही धरती पर पड़ोसी के विरुद्ध दीवारें ऊँची कर रहे हैं। वैश्विकता का वह सुंदर स्वप्न अब संकुचित क्षेत्रीय राजनीति के शोर में दम तोड़ रहा है। दक्षिणपंथी सोच और धार्मिक कट्टरपंथ के नए उभार ने मनुष्यता को पुनः कबीलों में बाँट दिया है।

‘माय कंट्री फर्स्ट’,का नारा सुनने में आकर्षक लग सकता है, पर जब यह ‘साझा मानवता’ की कीमत पर उछाला जाता है, तो यह आत्मघाती हो जाता है। संरक्षणवाद की आड़ में हम अपनी खिड़कियाँ बंद कर रहे हैं, यह भूलकर कि बंद कमरों में हवा दूषित हो जाती है और सभ्यताएँ सड़ जाती हैं।

कट्टरपंथ का यह नया चेहरा दरअसल हमारे भीतर के गहरे असुरक्षा बोध और ‘पराये’ के प्रति भय की उपज है। यह भय, दूसरे के धर्म, दूसरी संस्कृति, और दूसरे के विचार के प्रति, हमें सुरक्षित नहीं, बल्कि एकाकी और हिंसक बना रहा है।

आज की राजनीति संवेदनाओं पर हावी है और भूगोल दिलों को बाँट रहा है। संकीर्ण राष्ट्रीयता और कट्टरपंथी विचारधाराएं हमें यह सिखा रही हैं कि जो हमारे जैसा नहीं दिखता या नहीं सोचता, वह हमारा शत्रु है। यह सोच उस ‘वैश्विक ग्राम’ की जड़ों में मट्ठा डालने जैसा है, जिसे हमने बड़ी उम्मीदों से सींचा था।

हमें यह समझना होगा कि धरती पर खींची गई लकीरें प्रशासन की सुविधा के लिए तो हो सकती हैं, पर वे आत्मा की जेल नहीं होनी चाहिए। राष्ट्रों की सुरक्षा अनिवार्य है, पर मनुष्यता का गला घोंटकर नहीं। एक पक्षी जब बिना वीज़ा के सीमा पार करता है, तो वह हमारी व्यवस्थाओं पर हँसता प्रतीत होता है। हवाओं, खुशबू और संगीत का कोई पासपोर्ट नहीं होता, क्योंकि प्रकृति जानती है कि विस्तार ही जीवन है और संकुचन ही मृत्यु।

यह समय आत्ममंथन का है। यह समय आह्वान है, उस ‘मानवीय चेतना’ की ओर लौटने का, जहाँ करुणा का कोई भौगोलिक मानचित्र न हो। हमें अपनी पहचान के साथ-साथ अपनी सार्वभौमिक मानवता को भी बचाना होगा। जिस दिन एक इंसान दूसरे के दुख को बिना उसकी राष्ट्रीयता या धर्म पूछे महसूस करेगा, उसी दिन ये ‘दिलों की दूरी’ समाप्त होगी। सरहदें नक्शों पर सुशोभित हों तो ठीक, पर उन्हें संवेदनाओं के बीच नहीं खड़ा होना चाहिए। याद रहे, मानचित्र मनुष्य की रचना है, पर मनुष्यता उस असीम चेतना की संरचना है , जिसका विभाजन संभव नहीं है। *(विभूति फीचर्स)*

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