फर्रुखाबाद/
आलू की खेती के लिए प्रदेशभर में पहचान रखने वाले फर्रुखाबाद जिले में इन दिनों अन्नदाता दोहरी मार झेलने को मजबूर हैं। एक तरफ मौसम का लगातार बदलता मिजाज किसानों की चिंता बढ़ा रहा है, तो दूसरी तरफ बाजार में आलू के गिरते दाम ने उनकी आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ा दिया है। हालात ऐसे हैं कि कोल्ड स्टोरेज में महीनों से आलू सुरक्षित रखने के बावजूद किसानों को उसकी बिक्री से लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है। ऐसे में किसानों के सामने पुरानी फसल का हिसाब बराबर करने और नई फसल से उम्मीद लगाने की चुनौती खड़ी हो गई है।
कमालगंज विकासखंड के जरारी क्षेत्र सहित आसपास के ग्रामीण इलाकों में आलू उत्पादक किसान इन दिनों खासे परेशान नजर आ रहे हैं। बाजार में आलू का अपेक्षित भाव नहीं मिलने से किसानों को अपनी उपज बेचने में परेशानी हो रही है। किसानों का कहना है कि खेती में बीज, खाद, दवा, सिंचाई, मजदूरी और भंडारण पर लगातार खर्च बढ़ता जा रहा है, लेकिन जब फसल बेचने की बारी आती है तो बाजार में मिलने वाला भाव उनकी उम्मीदों पर पानी फेर देता है। इससे मेहनत और खर्च के मुकाबले आमदनी बेहद कम रह जाती है।
इधर मौसम ने भी किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। आसमान में लगातार बादल छाए रहने और बीच-बीच में हो रही बूंदाबांदी से किसान मौसम के अगले रुख को लेकर आशंकित हैं। आलू की खेती में मौसम का विशेष महत्व होता है। ऐसे में मौसम में अचानक बदलाव होने से खेतों की तैयारी और फसल की बुवाई को लेकर किसानों को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ रही है।
इन तमाम परेशानियों के बावजूद किसान हिम्मत नहीं हार रहे हैं। खेतों में अगली आलू की फसल की बुवाई का काम तेजी से चल रहा है। जिले में अब तक लगभग 60 प्रतिशत आलू की बुवाई पूरी होने की बात सामने आ रही है। किसान उम्मीद लगाए बैठे हैं कि इस बार मौसम अनुकूल रहेगा और बाजार में उनकी उपज को बेहतर कीमत मिलेगी, जिससे पिछले नुकसान की भरपाई हो सकेगी।
गौरतलब है कि फर्रुखाबाद जनपद की अर्थव्यवस्था में आलू की खेती की अहम भूमिका है। जिले के हजारों किसान परिवारों की आजीविका सीधे तौर पर आलू उत्पादन और उससे जुड़े कारोबार पर निर्भर करती है। खेतों से लेकर कोल्ड स्टोरेज, मंडियों और व्यापारिक गतिविधियों तक आलू का कारोबार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देता है। ऐसे में आलू के दामों में गिरावट का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे जुड़े अन्य कारोबारियों और मजदूरों पर भी पड़ता है।
किसानों के सामने इस समय सबसे बड़ी चिंता यही है कि जब पिछली फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है, तो अगली फसल में लगने वाली पूंजी की व्यवस्था कैसे होगी। नई फसल के लिए बीज, खाद और अन्य कृषि सामग्री खरीदने में भी खर्च करना पड़ रहा है। ऊपर से मौसम की अनिश्चितता ने उनकी चिंता और बढ़ा दी है।
