अमृतपुर /फर्रुखाबाद |
जनसुनवाई में अपनी शिकायत लेकर पहुंचे दिव्यांग पति-पत्नी की परेशानी देख क्षेत्राधिकारी अमृतपुर ने संवेदनशीलता का परिचय दिया। दंपती को अपनी समस्या बताने के लिए कार्यालय के भीतर आने की जरूरत न पड़े, इसके लिए क्षेत्राधिकारी स्वयं कार्यालय से बाहर निकलकर उनके पास पहुंचे। उन्होंने दिव्यांग दंपती की बात गंभीरता और धैर्य के साथ सुनी।
क्षेत्राधिकारी के इस व्यवहार से दिव्यांग दंपती को अपनी बात रखने में सहूलियत हुई। उन्होंने अपनी समस्या से संबंधित पूरी जानकारी क्षेत्राधिकारी को दी। अधिकारी ने उनकी शिकायत को ध्यानपूर्वक सुना और मामले से जुड़े आवश्यक बिंदुओं को समझा। उन्होंने दंपती को भरोसा दिलाया कि उनकी शिकायत को गंभीरता से लेते हुए नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
शिकायत सुनने के बाद क्षेत्राधिकारी ने संबंधित अधिकारी और कर्मचारियों को मामले के शीघ्र एवं प्रभावी निस्तारण के निर्देश दिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि शिकायत के समाधान में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। संबंधित को मामले की जांच कर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए कहा गया, ताकि पीड़ित दंपती को जल्द राहत मिल सके।
जनसुनवाई के दौरान क्षेत्राधिकारी ने यह भी संदेश दिया कि पुलिस के पास अपनी समस्या लेकर आने वाला प्रत्येक व्यक्ति महत्वपूर्ण है। खासकर दिव्यांग, बुजुर्ग और जरूरतमंद फरियादियों की समस्याओं को संवेदनशीलता के साथ सुना जाना चाहिए। उन्होंने अधीनस्थों को भी निर्देश दिए कि जनसुनवाई में आने वाली शिकायतों को केवल दर्ज करने तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उनके समाधान के लिए प्रभावी कार्रवाई की जाए।
कार्यालय से बाहर निकलकर दिव्यांग दंपती के पास पहुंचना जनसुनवाई के दौरान चर्चा का विषय रहा। क्षेत्राधिकारी की इस पहल ने पुलिस की जनसेवा की भूमिका को भी सामने रखा। मौजूद लोगों ने अधिकारी के इस संवेदनशील व्यवहार की सराहना की। लोगों का कहना था कि जब अधिकारी स्वयं फरियादी के पास पहुंचकर उसकी बात सुनता है तो इससे आमजन में पुलिस के प्रति विश्वास और मजबूत होता है।
क्षेत्राधिकारी ने संबंधित को निर्देशित किया कि शिकायत का नियमानुसार शीघ्र निस्तारण करते हुए आवश्यक कार्रवाई की जाए। जनसुनवाई के दौरान उनकी पहल ने यह संदेश दिया कि फरियादियों की समस्या सुनना महज औपचारिकता नहीं, बल्कि पुलिस की जिम्मेदारी है। दिव्यांग दंपती की परेशानी को प्राथमिकता से सुनकर कार्रवाई के निर्देश देना इसी संवेदनशील जनसेवा की एक मिसाल के रूप में सामने आया।

