कौड़ी का कमाल…

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*कौड़ी का कमाल…*

(पवन वर्मा-)

कभी भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे छोटी इकाइयों में गिनी जाने वाली कौड़ी इन मध्य प्रदेश की राजनीति के साथ ही न्यूज़ एंकर और यू ट्यूबर्स के बीच धमाल और कमाल कर रही है। यह वही कौड़ी है, जिसे लेकर सदियों से कहावतें बनती रहीं, मुहावरे गढ़े जाते रहे और लोगों की हैसियत का आकलन तक किया जाता रहा। आधुनिक भारत में उसकी हालत ऐसी हो गई थी कि नई पीढ़ी के अधिकांश लोग यह तक नहीं जानते थे कि कौड़ी आखिर होती क्या है। बहुत युवाओं और बच्चों को तो यह किसी कार्टून पात्र का नाम लगती थी और कुछ इसे किसी समुद्री जीव का खोल भर समझते थे।

अब आप कमाल देखिए। जिस कौड़ी को इतिहास की धूल ने ढक दिया था, जिसे संग्रहालयों और लोककथाओं में जगह मिली थी, वही कौड़ी अचानक राष्ट्रीय विमर्श – बहस और राजनीति में टकराहट का हिस्सा बन गई। टीवी चैनलों की बहसों में उसका नाम गूंजने लगा, राजनीतिक मंचों पर उसका उल्लेख होने लगा और सोशल मीडिया पर उसकी ऐसी वापसी हुई कि लगता है मानो भारतीय रिजर्व बैंक जल्द ही “कौड़ी श्रृंखला” के नए नोट जारी करने वाला हो।

कौड़ी शायद अपने जीवन में पहली बार इतनी खुश होगी। वह सोच रही होगी कि जब मैं सचमुच चलन में थी, तब भी लोगों ने मुझे इतना सम्मान नहीं दिया था, जितना आज मेरे नाम पर बहस करके दे रहे हैं। एक समय था जब किसी को अपमानित करना हो तो कहा जाता था “तुम्हारी तो कौड़ी भर कीमत नहीं है।” किसी वस्तु का मूल्य कम बताना हो तो कहा जाता था, “यह तो कौड़ी के भाव बिक रही है।” किसी की आर्थिक स्थिति खराब हो तो लोग कहते थे “इसके पास फूटी कौड़ी भी नहीं है।”बेचारी कौड़ी ने सदियों तक अपमान का यह बोझ ढोया। किसी ने यह नहीं कहा कि “तुम करोड़ों की कीमत के हो” या “तुम सोने के भाव बिक रहे हो”। नकारात्मक उदाहरण देना हो तो हर बार बेचारी कौड़ी को ही आगे कर दिया जाता था।

कौड़ी भारतीय भाषाओं में शायद सबसे अधिक बदनाम मुद्रा रही है।

इतिहासकार बताते हैं कि कभी भारत, चीन और अफ्रीका के अनेक हिस्सों में कौड़ियों का उपयोग मुद्रा के रूप में होता था। समुद्र से निकलने वाली छोटी-छोटी कौड़ियों से व्यापार होता था। लेन-देन में इनका इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन समय बदला, सिक्के आए, फिर कागजी नोट आए और बाद में डिजिटल भुगतान का युग आ गया।

यूपीआई के इस दौर में कौड़ी की स्थिति वैसी हो गई थी जैसी पुराने जमाने के टेलीफोन बूथ की है। लोग उसे जानते तो थे, लेकिन उपयोग कोई नहीं करता था। फिर अचानक इन दिनों उसकी किस्मत बदल दी।

अब हालात ऐसे हैं कि अगर कौड़ी का कोई जनसंपर्क अधिकारी होता तो वह प्रेस विज्ञप्ति जारी करके कहता, “हमें यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि वर्षों की उपेक्षा के बाद कौड़ी ब्रांड ने भारतीय सार्वजनिक जीवन में सफल वापसी की है।”

सोचिए, सदियों से चुपचाप संग्रहालयों में पड़ी कौड़ियां अचानक जागी होंगी और एक-दूसरे से पूछ रही होंगी…

“बहन, यह बाहर इतना शोर-शराबा किस बात का है?”

दूसरी कौड़ी जवाब देती है…

“लगता है फिर से हमारा जमाना आ गया है।”

पहली कौड़ी आश्चर्य से पूछती, “क्या बैंक ने हमें चलन में ला दिया?”

दूसरी कहती,

“नहीं, राजनीति और न्यूज़ एंकर ने हमें चलन में ला दिया है।”

राजनीति में वैसे भी पुरानी चीजों को पुनर्जीवित करने की अद्भुत क्षमता होती है। कभी इतिहास के नायकों की चर्चा होती है, कभी पुराने नारों की वापसी होती है और कभी-कभी तो ऐसे शब्द भी वापस आ जाते हैं जिन्हें भाषा-विज्ञानियों ने लगभग मृत घोषित कर दिया था। कौड़ी उन्हीं शब्दों में से एक है।

सोशल मीडिया पर अब स्थिति यह है कि लोग अर्थशास्त्र नहीं पढ़ रहे, बल्कि कौड़ीशास्त्र पढ़ रहे हैं। गूगल पर खोज हो रही है। “कौड़ी का इतिहास”,”एक कौड़ी की कीमत कितनी थी?”,”कौड़ी और शंख में क्या अंतर है?”,

“फूटी कौड़ी आखिर होती क्या है?”

संभव है कि आने वाले दिनों में किसी विश्वविद्यालय का शोधार्थी पीएचडी का विषय चुन ले “इक्कीसवीं सदी के भारतीय राजनीतिक विमर्श में कौड़ी का पुनर्जागरण : कारण, प्रभाव और संभावनाएं”। शोध के दौरान उसे पता चलेगा कि कौड़ी ने वह लोकप्रियता हासिल कर ली थी, जिसके लिए कई नेता, न्यूज़ एंकर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर वर्षों मेहनत करते हैं।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक परेशानी अर्थशास्त्रियों को हो रही होगी। उन्होंने वर्षों तक मुद्रा प्रणाली पर शोध किया, वित्तीय समावेशन पर लेख लिखे, डिजिटल भुगतान पर संगोष्ठियां आयोजित कीं, लेकिन जनता अचानक कौड़ी पर चर्चा करने लगी। उधर संग्रहालयों के कर्मचारी भी हैरान होंगे। जिन वस्तुओं को देखने महीनों कोई नहीं आता था, अब लोग पूछ रहे होंगे कि “कौड़ी वाला सेक्शन कहाँ है?”

पर्यटन विभाग चाहे तो “कौड़ी दर्शन यात्रा” शुरू कर सकता है। स्कूलों की पाठ्यपुस्तकों में भी संशोधन संभव है। इतिहास की किताब में नया अध्याय जोड़ा जा सकता है,

“कौड़ी: प्राचीन मुद्रा से आधुनिक बहस तक।”बच्चे परीक्षा में उत्तर लिखेंगे… “कौड़ी एक प्राचीन मुद्रा थी, जिसे आधुनिक राजनीति और न्यूज़ एंकर ने पुनः लोकप्रिय बनाया।” तब परीक्षक भी शायद मुस्कुरा देंगे।

सबसे मजेदार स्थिति भाषा विशेषज्ञों की होगी। वे वर्षों से छात्रों को मुहावरों का अर्थ समझाते रहे हैं। अब उन्हें मुहावरों के साथ समसामयिक संदर्भ भी बताने पड़ेंगे।

“दो कौड़ी के भाव” का अर्थ केवल सस्ता नहीं रहेगा, बल्कि “राष्ट्रीय चर्चा का विषय” भी माना जा सकता है।अगर यही रफ्तार रही तो भविष्य में कोई स्टार्टअप “कौड़ीकॉइन” नाम की डिजिटल मुद्रा भी लॉन्च कर सकता है। निवेशक पूछेंगे कि “इसका आधार क्या है?”

जवाब मिलेगा

“जनभावना और राजनीतिक लोकप्रियता।”

और यदि किसी दिन शेयर बाजार में “कौड़ी इंडेक्स” बन गया तो आश्चर्य मत कीजिएगा। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सबक यही है कि सार्वजनिक जीवन में कोई भी चीज कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होती। शब्द, प्रतीक, मुहावरे और यादें समय-समय पर नए रूप में लौटते रहते हैं। कभी वे साहित्य में लौटते हैं, कभी फिल्मों में, कभी बुद्धू बक्से पर और कभी राजनीति में,तो अब कौड़ी भी लौट आई है।

वह अब इतिहास की अलमारी से निकलकर सार्वजनिक बहस के मंच पर आ खड़ी हुई है। सदियों तक उपेक्षा सहने वाली यह छोटी-सी वस्तु आज शायद मुस्कुराकर कह रही होगी कि “जब मैं मुद्रा थी, तब लोगों ने मुझे कम आंका। जब मैं चलन से बाहर हुई, तब मुझे भुला दिया। अब देखो, आज पूरे देश में मेरी चर्चा हो रही है।”

और सच पूछिए तो यह कौड़ी की नहीं, भारतीय लोकतंत्र की भी खूबी है। यहां कभी-कभी ऐसी चीजें भी सुर्खियों में आ जाती हैं, जिनके बारे में लोगों ने वर्षों से सोचा तक नहीं होता इसलिए अगली बार कोई आपसे कहे कि उसके पास फूटी कौड़ी नहीं है, या आप दो कौड़ी के हो तो उसे हल्के में मत लीजिए,हो सकता है वह अनजाने में उस वस्तु का नाम ले रहा हो, जो इन दिनों रुपये, डॉलर और बिटकॉइन से भी ज्यादा चर्चा बटोर रही है। क्योंकि इस समय देश में यदि किसी मुद्रा की सबसे अधिक राजनीतिक और भाषाई वैल्यू है, तो वह शायद दो कौड़ी ही है। *(विनायक फीचर्स)*

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