एटा जीएसटी में ‘खेल’ के आरोप, कागजों में 80 फीसदी प्रगति?
शिकायतों का निस्तारण या शिकायतकर्ताओं को उलझाने का सिलसिला? सचल दल की कार्रवाई पर भी सवाल, राजस्व वसूली की पारदर्शिता पर उठी उंगली
एटा। जीएसटी विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर एटा में गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि विभागीय कार्यालय में उनकी समस्याओं और मांगी गई सूचनाओं का समुचित जवाब नहीं दिया जाता। शिकायत लेकर पहुंचने वाले लोगों को समाधान देने के बजाय प्रक्रिया और पत्राचार के नाम पर लंबे समय तक उलझाए रखने के आरोप भी सामने आए हैं।
मामला केवल शिकायतों के निस्तारण तक सीमित नहीं है। विभाग की प्रगति रिपोर्ट और जमीनी हकीकत में कथित अंतर को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि अलग-अलग यूनिटों में वास्तविक काम की स्थिति कुछ भी हो, उच्च अधिकारियों और जिला प्रशासन को भेजी जाने वाली रिपोर्ट में 70 से 80 प्रतिशत तक प्रगति दर्शाए जाने का दावा किया जाता है।
कागजों में कार्रवाई, जमीन पर सवाल
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जिन मामलों में प्रभावी जांच और कार्रवाई की आवश्यकता है, उनमें भी कई बार केवल औपचारिकता पूरी किए जाने के आरोप हैं। सचल दल की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए आरोप लगाया गया है कि उसकी कार्रवाई कई मामलों में खानापूर्ति तक सीमित रहती है।
सबसे गंभीर आरोप कुछ फर्म संचालकों से कथित ‘माहवारी’ वसूली को लेकर लगाए गए हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि कार्रवाई के बजाय कथित लेन-देन के माध्यम से मामलों को निपटाने की कोशिश की जाती है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह सरकारी राजस्व और विभाग की कार्यप्रणाली दोनों के लिए बेहद गंभीर मामला होगा।
एटा के राजस्व को लेकर भी उठे सवाल
शिकायतकर्ताओं ने यह भी सवाल उठाया है कि एटा से जीएसटी के रूप में कितना राजस्व प्राप्त हो रहा है और उसके सापेक्ष विभाग की कार्रवाई एवं उपलब्धियां क्या हैं, इसकी यूनिटवार पारदर्शी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?
उनका आरोप है कि यदि किसी यूनिट में अपेक्षाकृत कम कार्रवाई हुई है तो दूसरी यूनिट में अधिक कार्रवाई दिखाकर कुल प्रगति को बेहतर दर्शाने की कोशिश की जाती है। ऐसे में वास्तविक स्थिति और रिपोर्ट के बीच अंतर की स्वतंत्र जांच जरूरी बताई जा रही है।
डीएम और उच्चाधिकारियों से जांच की मांग
अब शिकायतकर्ताओं ने जिलाधिकारी तथा जीएसटी विभाग के उच्चाधिकारियों से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। मांग है कि—
- यूनिटवार वास्तविक कार्रवाई और भेजी गई प्रगति रिपोर्ट का मिलान कराया जाए।
- शिकायतों के निस्तारण की स्वतंत्र समीक्षा हो।
- सचल दल द्वारा की गई कार्रवाई का रिकॉर्ड जांचा जाए।
- सरकारी राजस्व की वसूली और लक्ष्य के सापेक्ष उपलब्धियों का ऑडिट कराया जाए।
- अधिकारियों पर लगाए गए कथित वसूली के आरोपों की निष्पक्ष जांच हो।
- सूचना मांगने वाले शिकायतकर्ताओं को उपलब्ध कराई गई जानकारी और लंबित मामलों की समीक्षा की जाए।
बड़ा सवाल यही है—अगर विभागीय रिकॉर्ड में सब कुछ ठीक है तो स्वतंत्र जांच और यूनिटवार आंकड़े सार्वजनिक करने में हिचक क्यों? अब देखना यह है कि उच्चाधिकारी इन गंभीर आरोपों को महज शिकायत मानकर फाइल बंद करते हैं या एटा जीएसटी की कार्यप्रणाली की वास्तविकता सामने लाने के लिए जांच बैठाते हैं।

