Article : अब बंगाल में हिंसा का रामराज्य!

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अब बंगाल में हिंसा का रामराज्य!

(आलेख : संजय पराते)

भाजपा की नई सरकार ने अभी शपथ ग्रहण किया भी नहीं है कि प. बंगाल में हिंसा का नया दौर शुरू हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट का यह विश्वास धूल में मिल गया कि चुनाव के बाद बंगाल में हिंसा खत्म हो जाएगी। चूंकि बंगाल में पुलिस अभी भी चुनाव आयोग के मातहत है, इसलिए चुनाव नतीजों के बाद की हिंसा के लिए चुनाव आयोग को पूरी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। आयोग ने हिंसक घटनाओं के प्रति शून्य सहनशीलता (‘ज़ीरो टॉलरेंस’) की बात कही है, लेकिन यह हिंसा केंद्र के अर्धसैन्य बलों की 2600 कंपनियों के 2 लाख से ज्यादा जवानों की उपस्थिति में और उसकी निष्क्रियता में हो रही है, इसलिए चुनाव आयोग की बातें बेमानी हो जाती है। ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग भाजपा के रामराज्य की जगह संविधान और कानून के राज को स्थापित करने की बिल्कुल इच्छा नहीं रखती।

अब पूरा बंगाल भाजपा के बुलडोजर राज को देखेगा। यही उसका रामराज्य भी है, जिसे उत्तरप्रदेश सहित देश के भाजपा शासित 20 राज्य पहले से देख रहे हैं। बंगाल इस स्वाद को चखने वाला 21वां राज्य होगा। अभी तो यह शुरूआत है। अगले पांच सालों में न जाने कितने राजनैतिक कार्यकर्ताओं को अपनी शहादत देनी होगी, न जाने कितने निर्दोषों के घर जलाए जाएंगे, न जाने कितने हजार लोगों को अपने घर-गांव और राज्य से विस्थापित होना पड़ेगा, न जाने कितने लोगों की जमीन और उनकी आजीविका कॉरपोरेटों के लिए छीनी जाएंगी। बंगाल के भाग्य में यही सब लिखा है।

जिस बंगाल में एक बड़ा वामपंथी आंदोलन आजादी के पहले से रहा है, वहां भाजपा की जीत के बाद लेकिन की मूर्ति तोड़कर गिरा दी गई है। पाठकों को याद होगा कि त्रिपुरा में भी भाजपा ने चुनाव जीतने के बाद पहला हमला लेनिन की मूर्ति पर ही किया था। त्रिपुरा की भाजपाई हिंसा को अब फिर बंगाल में दोहराया जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस के दफ्तरों और कार्यकर्ताओं पर बड़े पैमाने पर हमले शुरू हो चुके हैं, लेकिन वामपंथ भी इस हिंसा से अछूता नहीं है, जिसने इस चुनाव में मात्र दो सीटें ही जीती हैं। वामपंथ के प्रति संघी गिरोह की नफरत किसी से छुपी नहीं है, क्योंकि उसके हिंदू राष्ट्र के रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट वही है, चाहे उसकी गिनती बंगाल या देश में कितनी भी कमजोर ताकत के रूप में क्यों न की जाएं!

अब यह पूरी तरह से साफ है कि बंगाल में चुनाव भाजपा नहीं लड़ रही थी, चुनाव लड़ रही थी केन्द्र की मोदी सरकार, जिसके साथ चुनाव आयोग और इस देश का सुप्रीम कोर्ट खुलकर खड़ा था। भाजपा ने यह चुनाव जीता है इस देश के लाखों नागरिकों को अवैध रूप से मतदाता सूचियों से बाहर करके, जिनके बारे में यह दुष्प्रचार किया गया कि वे तो कभी इस देश के नागरिक जी नहीं थे और घुसपैठिया है, जिन्हें देश से बाहर करने का पुनीत काम भाजपा कर रही है ; जबकि इस देश का चुनाव आयोग यह बताने तक कि स्थिति में नहीं है कि एसआईआर के बाद उसने कितने घुसपैठियों कि शिनाख्त की है। चुनाव प्रचार के दौरान जितना सांप्रदायिक विषवमन भाजपा ने किया, वह अभूतपूर्व था। भाजपा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने में कामयाब रही। चुनाव आचार संहिता की मोदी-शाह के नेतृत्व में धज्जियां उड़ाई गई, लेकिन चुनाव आयोग ने इस सबका संज्ञान तक लेना उचित नहीं समझा।

आज ममता बनर्जी भाजपा के नाम पर तो रही है। एक संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने दावा किया है : “जब हम जीते थे, हमने सीपीएम के किसी भी पार्टी कार्यालय को हाथ नहीं लगाया था, अत्याचार नहीं किया था।” ममता आज झूठ बोल रही है। सभी जानते है कि वामपंथ को हराने के लिए ममता ने भाजपा-आरएसएस के साथ कितना गहरा संबंध बनाया था कि संघी गिरोह ने उन्हें “मां काली” की उपमा तक दी थी और गदगदाई ममता मोहन भागवत से आशीर्वाद लेने से भी नहीं चुकी थी। बंगाल में भाजपा की सांप्रदायिक और फासीवादी राजनीति को पैर जमाने का मौका ममता ने ही दिया है।

बंगाल की सत्ता पर काबिज हुई ममता का सबसे बड़ा दुश्मन वामपंथ ही था। तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनने के पहले तीन महीनों में ही सीपीआई(एम) के जिन 30 नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई थी, उनमें से 10 अल्पसंख्यक, 3 आदिवासी और 11 अनुसूचित जाति से थे। इनमें तीन महिलाएं भी शामिल थीं। मरने वालों में खेतिहर मजदूर और गरीब किसान भी थे। बंगाल में तृणमूल शासन के 15 साल वामपंथ और विशेषकर माकपा पर अनवरत हमलों के साल थे। इन हमलों में सैकड़ों वामपंथी कार्यकर्ता शहीद हुए, वामपंथ के सैकड़ों दफ्तरों पर कब्जा किया गया या आग लगा दी गई, हजारों साधारण लोगों को अपने घरों और गांवों से पलायन करना पड़ा, हजारों कार्यकर्ताओं को केवल इसलिए निष्क्रियता की चादर ओढ़नी पड़ी कि उनकी मां-बहनों के बलात्कार की धमकियां दी गई। बलात्कार को एक राजनैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया, जो संघी गिरोह के पूजनीय सावरकर का सिद्धांत था। बंगाल की जनतांत्रिक संस्कृति को फासीवादी संस्कृति में ढालने का काम ममता बनर्जी ने किया। तो अब ममता के पतन पर रोने वाला कौन मिलेगा?

देश का राजनैतिक इतिहास बताता है कि जिस भी पार्टी ने भाजपा को अपना सगा माना, भाजपा ने उसे ठगा ही है और उसका पतन हुआ है। ममता बनर्जी की कहानी इससे अलग नहीं है। ममता आज सड़क पर संघर्ष की बात कर रही है, यह संघर्ष उसे वामपंथ पर छोड़ देना चाहिए, क्योंकि वामपंथ ही सड़कों पर संघर्षों के कारण पलता-बढ़ता और जिंदा रहता है। ममता को आप और केजरीवाल की हालत पर गौर करना चाहिए और अब उसे अपने चुने हुए सांसदों और नव-निर्वाचित विधायकों को बचाने की चिंता करनी चाहिए। भाजपा की बंगाल फतह के बाद एक पार्टी के रूप में तृणमूल का अस्तित्व भी संकट में पड़ गया है।

*(लेखक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं।

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