उस्ताद साहब की याद में दरगाह पर सजी मिलाद की महफिल, हुआ लंगर का एहतेमाम |

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Manoj Jauhri
Manoj Jauhri ब्यूरो चीफ (फर्रुखाबाद) - एक अनुभवी पत्रकार हैं, जो राजनीति, अपराध, शिक्षा, मनोरंजन और स्थानीय समाचारों पर पोस्ट करते हैं। वे तथ्यों पर आधारित...
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कायमगंज/फर्रुखाबाद।

किसी ने उन्हें उर्दू अदब का माहिर उस्ताद बताया, तो किसी ने उन्हें इल्म, इबादत और इंसानियत की मिसाल कहा। उनकी जिंदगी सादगी, खुदापरस्ती और खिदमत-ए-खल्क यानी इंसानियत की सेवा का ऐसा पैगाम थी, जिसे आज भी लोग याद करते हैं। ये शख्सियत थीं मुर्शिदी व मौलाई सरकार सैय्यदना शेख हजरत मुनीर अहमद शाह रहमतुल्लाह अलैह, जिन्हें अकीदतमंद मोहब्बत से उस्ताद साहब के नाम से याद करते हैं। उनकी याद में दरगाह हजरत बाबा जूही शाह रहमतुल्लाह अलैह पर सालाना नजर, मिलादुन्नबी और लंगर का एहतेमाम किया गया। कार्यक्रम में उलमा-ए-किराम ने हुजूर सरकार-ए-दो आलम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की शान बयान की और हजरत मुनीर अहमद शाह की जिंदगी, उनकी इल्मी काबिलियत तथा इंसानियत के लिए किए गए कार्यों पर रोशनी डाली।

उर्दू, हिंदी, अंग्रेजी और अरबी के थे माहिर

कार्यक्रम में मुफ्ती मुनीर अहमद साहब किब्ला ने मिलाद-ए-मुस्तफा के दौरान नबी-ए-पाक की शान बयान की। इसके बाद दरगाह के जानशीन व खलीफा सूफी हजरत मुशीर अहमद कादरी चिश्ती वारसी ने अपने दादा हुजूर हजरत मुनीर अहमद शाह की जिंदगी के कई अहम पहलुओं को सामने रखा।

उन्होंने बताया कि उस्ताद साहब अपने दौर में उर्दू अदब के बेहतरीन जानकार और कुशल शिक्षक थे। उर्दू के साथ हिंदी, अंग्रेजी और अरबी भाषा पर भी उनकी अच्छी पकड़ थी। वह केवल किताबी इल्म तक सीमित नहीं थे, बल्कि शारीरिक प्रशिक्षण में भी माहिर थे। उन्हें तलवार, भाला और बरछी चलाने का हुनर हासिल था। उनका अपना अखाड़ा भी था, जहां वह लोगों को प्रशिक्षण दिया करते थे।

फज्र के बाद अखाड़ा, फिर बच्चों को तालीम और उसके बाद रोजी-रोटी की जद्दोजहद

हजरत मुनीर अहमद शाह की दिनचर्या अनुशासन, मेहनत और जिम्मेदारियों का अनूठा उदाहरण थी। फज्र की नमाज के बाद वह अखाड़े में जाते और लोगों को व्यायाम व शारीरिक प्रशिक्षण देते थे। इसके बाद मोहल्ले के बच्चों को उर्दू, अरबी, हिंदी और अंग्रेजी की तालीम देते थे।

बच्चों को शिक्षा देने के बाद वह अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए दुकान पर काम करते थे। कायमगंज के लोग उन्हें स्टोव, टॉर्च, लालटेन और हांडा आदि की मरम्मत व संबंधित कामों के लिए भी जानते थे। वह शादी-विवाह जैसे आयोजनों में लालटेन और हांडा किराये पर उपलब्ध कराते थे। इस तरह उन्होंने अपने कारोबार के जरिए लोगों को रोजगार देने का काम भी किया।

उनकी जिंदगी का यह पहलू बताता है कि वह एक तरफ बच्चों को इल्म बांटते थे, तो दूसरी तरफ मेहनत-मशक्कत से अपने परिवार की जिम्मेदारियां निभाते हुए दूसरे लोगों के लिए भी रोजी-रोटी का जरिया बनते थे।

दौलत होने के बावजूद सादगी ऐसी कि बच्चों को भी नहीं होने दिया एहसास

सूफी हजरत मुशीर अहमद कादरी चिश्ती वारसी ने बताया कि उस्ताद साहब की जिंदगी का सबसे खास पहलू उनकी सादगी और जरूरतमंदों के प्रति हमदर्दी थी। वह लोगों के दुख-दर्द में शरीक होते और जरूरत पड़ने पर उनकी मदद करते थे। उनकी मदद करने का अंदाज भी ऐसा था कि कई बार उनके अपने बच्चों तक को इसकी जानकारी नहीं हो पाती थी।

बताया गया कि आर्थिक रूप से संपन्न होने के बावजूद उन्होंने अपने बच्चों की परवरिश बेहद सादगीपूर्ण माहौल में की। उन्होंने कभी धन-दौलत को जिंदगी का मकसद नहीं बनाया और न ही भविष्य की चिंता में अपनी इबादत तथा इंसानी जिम्मेदारियों को पीछे छोड़ा। उनके लिए असल दौलत इल्म, नेक अमल, इबादत और जरूरतमंदों की मदद थी।

इबादत में इस कदर मशगूल रहते थे कि सांस फूल जाती, फिर भी नहीं छोड़ते थे नमाज

हजरत मुनीर अहमद शाह की इबादत और परहेजगारी के किस्से आज भी लोगों की जुबान पर हैं। उनके दौर के कई लोग, जो अब उम्रदराज हो चुके हैं, उनकी जिंदगी से जुड़े संस्मरण सुनाते हैं। उनके मुताबिक उस्ताद साहब फर्ज नमाजों के बाद भी लंबे समय तक नफ्ल इबादत में मशगूल रहते थे। इबादत में उनकी तल्लीनता इतनी गहरी होती थी कि कभी-कभी सांस फूलने लगती और थकान के चलते वह जानमाज पर ही सो जाते थे।

उनकी जिंदगी को करीब से जानने वाले लोगों के अनुसार, वह कम बोलने और गंभीर स्वभाव के व्यक्ति थे। उनकी दिनचर्या में नमाज, जिक्र और अल्लाह की इबादत को विशेष स्थान प्राप्त था। यही वजह थी कि लोग उन्हें केवल एक शिक्षक के रूप में नहीं, बल्कि एक नेकदिल और इबादतगुजार बुजुर्ग के तौर पर भी याद करते हैं।

मिलाद की महफिल हो तो तमाम व्यस्तताओं के बावजूद पहुंच जाते थे उस्ताद साहब

हजरत मुनीर अहमद शाह की मोहब्बत का केंद्र नबी-ए-पाक की शान में जिक्र और मिलाद की महफिलें भी थीं। बताया गया कि दिनभर की व्यस्तताओं के बावजूद यदि कहीं मिलाद शरीफ की महफिल सजती, तो वह उसमें शिरकत करने जरूर पहुंचते थे। वह जिक्र-ए-मुस्तफा में शामिल होकर अपनी अकीदत का इजहार करते थे।

मगरिब से पहले अपने पीर-ओ-मुर्शिद की खिदमत में पहुंचना उनकी दिनचर्या का अहम हिस्सा था। वह अपनी कमाई में से कुछ रकम अपने पीर की खिदमत में पेश करते और फिर ईशा से पहले घर लौट आते थे। उनकी जिंदगी में पीर की खिदमत, बुजुर्गों का अदब, परिवार की जिम्मेदारी और इबादत के बीच एक खास संतुलन देखने को मिलता था।

नमाज से जुड़ी रही जिंदगी की आखिरी घड़ी

कार्यक्रम में बताया गया कि हजरत मुनीर अहमद शाह ने अपनी जिंदगी का अधिकांश समय अल्लाह की इबादत और लोगों की खिदमत में गुजारा। उनके इंतकाल से जुड़ा संस्मरण सुनाते हुए बताया गया कि जब उनका आखिरी वक्त आया, तब भी वह नमाज में मशगूल थे। नमाज से फारिग होने के बाद उन्होंने मौजूद लोगों से कुछ कलाम किया और फिर अपने मालिक-ए-हकीकी से जा मिले।

उनकी जिंदगी का यह प्रसंग सुनकर लोगों ने उन्हें एक ऐसे बुजुर्ग के रूप में याद किया, जिनके लिए इबादत केवल एक रस्म नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका थी। उनकी तालीम, तरबियत, सादगी और इंसानियत के प्रति समर्पण आज भी लोगों को नेक रास्ते पर चलने की प्रेरणा देता है।

दुआ के साथ हुआ कार्यक्रम का समापन, आम किया गया लंगर

सालाना नजर और मिलाद के मौके पर उलमा-ए-किराम ने बुजुर्गों के बताए रास्ते पर चलने, आपसी मोहब्बत कायम रखने और समाज में भाईचारे को मजबूत बनाने का संदेश दिया। दुआ की गई कि अल्लाह तआला सभी को बुजुर्गों के नक्शे-कदम पर चलने की तौफीक अता फरमाए, लोगों के दिलों में मोहब्बत पैदा करे और मुल्क हिंदुस्तान में अमन, चैन, शांति तथा खुशहाली कायम रखे।

इसके साथ ही देश की तरक्की, बच्चों के बेहतर मुस्तकबिल और उन्हें नेक राह पर चलने की तौफीक मिलने की दुआ की गई। दुआ के बाद लंगर आम किया गया, जिसमें लोगों ने शिरकत की।

ये लोग रहे मौजूद

कार्यक्रम में आकिल खान साहब, मुफ्ती मुनीर अहमद, मौलाना इमामुद्दीन सहित अन्य उलमा-ए-किराम ने बयान किया। इस मौके पर जमीर अहमद, तौहीद अहमद, तमहीद अहमद, बबलू भाई, सज्जाद खान, खलील खान, पप्पू भाई, रावेज खान, बंटी भाई, अमरेश गंगवार, मुन्ना राजपूत, आमिर हुसैन, हनीफ भाई, मुकीम जूही, सनी बॉथम, डॉ. अरशद मंसूरी, पवन बॉथम, गजनफर खान, हाफिज आजम खान, लाइक सिद्दीकी, बबलू सिद्दीकी, नोमान सिद्दीकी, अफजल, संजय शर्मा, राजू गुप्ता, करण भारद्वाज, सैयद जमाल अली, अब्दुल रहमान, आसिफ मंसूरी, अरविंद यादव, राहुल सागर, पप्पन सिद्दीकी, सलीम खान, अदीब खान, नावेद खान समेत बड़ी संख्या में अकीदतमंद मौजूद रहे।

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Manoj Jauhri ब्यूरो चीफ (फर्रुखाबाद) - एक अनुभवी पत्रकार हैं, जो राजनीति, अपराध, शिक्षा, मनोरंजन और स्थानीय समाचारों पर पोस्ट करते हैं। वे तथ्यों पर आधारित और विश्वसनीय समाचार सामग्री तैयार करने में विशेषज्ञता रखते हैं।
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