हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष

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हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष

*’सत्य’ और ‘जनसरोकार’ की तलाश में पत्रकारिता*

(विवेक रंजन श्रीवास्तव-विनायक फीचर्स)

भारतीय वांग्मय के पौराणिक संदर्भों को देखें तो देवर्षि नारद संभवतः सृष्टि के पहले पत्रकार कहे जा सकते हैं, जो लोकमंगल हेतु सूचनाओं का आदान-प्रदान करते थे। इसी कड़ी में कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि से संजय द्वारा धृतराष्ट्र को सुनाया गया आंखों देखा हाल ‘लाइव रिपोर्टिंग’ का अद्भुत उदाहरण है। आधुनिक विश्व में पत्रकारिता का बीज 131 ईसा पूर्व रोम के ‘एक्टा डियुर्ना’ (Acta Diurna) में मिलता है, जो प्रस्तर पट्टियों पर सूचनाएं अंकित कर सार्वजनिक स्थानों पर लगाया जाता था। 15वीं शताब्दी में योहन गूटनबर्ग द्वारा मुद्रण यंत्र (प्रिंटिंग प्रेस) के आविष्कार ने सूचनाओं के इस प्रवाह को पंख लगा दिए और 1605 में विश्व का पहला मुद्रित समाचार पत्र ‘रिलेशन’ अस्तित्व में आया।

हिंदी पत्रकारिता का विधिवत जन्म 30 मई 1826 को हुआ, जब पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने कलकत्ता से ‘उदंत मार्तंड’ (उगता हुआ सूरज) का प्रकाशन प्रारंभ किया। हालांकि भाषायी जटिलताओं और डाक व्यय के कारण यह साप्ताहिक पत्र मात्र छह माह ही चल सका, किंतु इसने हिंदी पत्रकारिता की वह मशाल जला दी थी, जिसे आगे चलकर राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारकों ने संरक्षण दिया। 1850 के दशक तक आते-आते प्रेस नियमों में ढील मिली और हिंदी पत्रों ने अपनी जड़ें जमानी शुरू की।

1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम ने पत्रकारिता के चरित्र को ‘सूचना’ से बदलकर ‘विद्रोह’ कर दिया। इस दौर में पत्रकारों ने कलम को तलवार की तरह इस्तेमाल किया। 20वीं सदी के प्रारंभ में जब स्वतंत्रता आंदोलन तीव्र हुआ, तब पत्रकारिता एक ‘मिशन’ बन गई।

इस कालखंड में महात्मा गांधी का प्रवेश हिंदी पत्रकारिता के लिए स्वर्ण युग सिद्ध हुआ। गांधीजी केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक प्रखर और आदर्शवादी संपादक भी थे। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में ‘इंडियन ओपिनियन’ से जो यात्रा शुरू की थी, उसे भारत में ‘नवजीवन’ और ‘हरिजन’ के माध्यम से पराकाष्ठा पर पहुँचाया। गांधीजी का मानना था कि “पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य सेवा होना चाहिए।” उन्होंने विज्ञापन रहित पत्रकारिता पर जोर दिया और हिंदी (हिंदुस्तानी) को जन-जन की भाषा बनाने के लिए अपने पत्रों को माध्यम बनाया। उनके संपादन में पत्रकारिता केवल समाचारों का संग्रह नहीं, बल्कि समाज सुधार और अहिंसक प्रतिरोध का शास्त्र बन गई। ‘प्रताप’ के गणेश शंकर विद्यार्थी और ‘भारत मित्र’ के बालमुकुंद गुप्त जैसे योद्धाओं ने गांधीवादी मूल्यों को धार दी।

स्वतंत्रता के बाद हिंदी को राजभाषा का गौरव मिला, जिससे पत्र-पत्रिकाओं का विस्तार महानगरों से निकलकर कस्बों तक पहुँचा। दैनिक समाचार पत्रों ने ग्रामीण भारत की नब्ज पहचानी। यह दौर पत्रकारिता के ‘साहित्यिक स्वरूप’ का भी था, जहाँ अज्ञेय, धर्मवीर भारती और रघुवीर सहाय जैसे दिग्गजों ने ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से पत्रकारिता को बौद्धिक गरिमा प्रदान की। 1975 का आपातकाल इस यात्रा का सबसे कठिन पड़ाव था, जहाँ प्रेस की स्वतंत्रता पर पहरे लगे, पर ‘सद्भावना’ जैसे भूमिगत पत्रों ने लोकतंत्र की लौ जलाए रखी।

1990 के दशक में उदारीकरण ने पत्रकारिता को ‘मिशन’ से ‘प्रोफेशन’ और फिर ‘मार्केट’ (बाजार) में बदल दिया। निजी समाचार चैनलों के उदय ने ‘ब्रेकिंग न्यूज’ की संस्कृति को जन्म दिया। प्रिंट मीडिया अब रंगीन और बहु-पृष्ठीय हो गया, लेकिन साथ ही ‘पेड न्यूज’ जैसी विसंगतियां भी उभरीं।

21वीं सदी का दूसरा दशक ‘डिजिटल संक्रमण’ का रहा। इंटरनेट और स्मार्टफोन ने हर नागरिक को ‘सिटीजन जर्नलिस्ट’ बना दिया। आज हिंदी पत्रकारिता सोशल मीडिया, पॉडकास्ट और एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के दौर में है। जहाँ एक ओर सूचनाएं क्षण भर में वैश्विक हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर ‘फेक न्यूज’ और ‘प्रेस फ्रीडम’ की चुनौतियां भी हिमालय की तरह खड़ी हैं।

हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों का इतिहास ‘उदंत मार्तंड’ की साधारण स्याही से लेकर आज के डिजिटल पिक्सल तक की महायात्रा है। यह यात्रा दर्शाती है कि माध्यम भले ही बदल गए हों,पत्थर से कागज और कागज से स्क्रीन,परंतु पत्रकारिता की आत्मा आज भी उसी ‘सत्य’ और ‘जनसरोकार’ की तलाश में है, जिसका सपना पंडित जुगल किशोर शुक्ल और महात्मा गांधी ने देखा था। आने वाला समय तकनीकी और नैतिकता के बीच संतुलन का है।

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