लैंगिक समानता के बिना विकसित समाज की कल्पना अधूरी : प्रो. शरद कुमार सोनकर
*एसडीजी-5 पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत किया शोध, अमेरिका शोध में सबसे आगे, ब्रिटेन दूसरे स्थान पर*
लखनऊ। लैंगिक समानता केवल महिलाओं के अधिकारों का विषय नहीं, बल्कि एक सभ्य, न्यायपूर्ण और समावेशी समाज की बुनियादी जरूरत है। महिलाओं के साथ भेदभाव, हिंसा और असमानता समाप्त किए बिना सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल नहीं किया जा सकता। इसके लिए महिलाओं को अधिक अधिकार देने के साथ प्रभावी नीतियों का निर्माण और उनका जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन जरूरी है। यह बात *बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू), लखनऊ के पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष प्रो. शरद कुमार सोनकर* ने श्रीलंका में आयोजित 20वें अंतरराष्ट्रीय वेबोमेट्रिक्स, इंफोमेट्रिक्स एवं साइंटोमेट्रिक्स (WIS) सम्मेलन में कही।
प्रो. सोनकर ने सम्मेलन में *‘Bibliometrics Analysis of Scholarly Communication on Sustainable Development Goal 5: Gender Equality’* विषय पर अपना शोध प्रस्तुत किया।
*15 हजार से अधिक शोध प्रकाशनों का विश्लेषण*
शोध में वर्ष *2015 से 2024* के बीच एसडीजी-5 और जेंडर इक्वैलिटी से संबंधित शोध साहित्य का अध्ययन किया गया। स्कोपस डेटाबेस से प्राप्त *15,498 शोध दस्तावेजों* का बिब्लियोमेट्रिक विश्लेषण किया गया। अध्ययन में Biblioshiny और VOSviewer जैसे उपकरणों का इस्तेमाल कर शोध प्रकाशनों, उद्धरणों, लेखकों, देशों और शोध सहयोग के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण किया गया।
अध्ययन में सामने आया कि लैंगिक समानता से जुड़े शोध में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। शोध प्रकाशनों की वार्षिक वृद्धि दर *17.51 प्रतिशत* रही। वर्ष 2024 में *2,781 शोध दस्तावेज* प्रकाशित हुए, जो अध्ययन अवधि में सर्वाधिक वार्षिक शोध उत्पादन रहा।
*अमेरिका का शोध प्रभाव सबसे अधिक*
देशवार विश्लेषण में *अमेरिका* लैंगिक समानता संबंधी शोध में सबसे प्रभावशाली देश के रूप में सामने आया। अमेरिका से जुड़े *2,554 शोध दस्तावेजों को 41,120 उद्धरण* मिले। वहीं *ब्रिटेन* 1,868 दस्तावेजों और 30,121 उद्धरणों के साथ दूसरे स्थान पर रहा। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी प्रमुख देशों में शामिल रहे।
विषयवार देखें तो *सामाजिक विज्ञान* का योगदान सबसे अधिक रहा। इस क्षेत्र में 6,494 शोध दस्तावेज यानी कुल शोध का *41.9 प्रतिशत* हिस्सा रहा। इसके बाद कला एवं मानविकी तथा बिजनेस, मैनेजमेंट एवं अकाउंटिंग प्रमुख क्षेत्र रहे।
*नीति और शोध के बीच बेहतर तालमेल जरूरी*
प्रो. सोनकर ने कहा कि लैंगिक समानता पर शोध का दायरा तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन शोध के निष्कर्षों को प्रभावी नीतियों और उनके क्रियान्वयन से जोड़ना अभी भी बड़ी चुनौती है। उन्होंने महिलाओं के खिलाफ होने वाले भेदभाव और अत्याचार को समाप्त करने तथा उन्हें शिक्षा, रोजगार, निर्णय लेने और सामाजिक जीवन में समान अवसर उपलब्ध कराने पर जोर दिया।
अध्ययन में वैश्विक दक्षिण की शोध भागीदारी बढ़ाने, दक्षिण-दक्षिण और उत्तर-दक्षिण शोध सहयोग को मजबूत करने तथा लैंगिक समानता को स्वास्थ्य, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों से जोड़कर बहुविषयक शोध को बढ़ावा देने की सिफारिश की गई है।
प्रो. सोनकर के अनुसार, *“लैंगिक समानता पर शोध का लगातार बढ़ता प्रकाशन यह बताता है कि यह वैश्विक शोध एजेंडे का महत्वपूर्ण विषय बन चुका है। अब आवश्यकता इस बात की है कि शोध के निष्कर्षों को प्रभावी नीति और वास्तविक सामाजिक परिवर्तन से जोड़ा जाए।”*

