ताकि दुबारा न हो सूरजकुंड जैसे हादसे !

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-सुनील कुमार महला

फरीदाबाद में आयोजित 39वें सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प महोत्सव 2026 के दौरान शनिवार, 7 फरवरी 2025 की शाम एक गंभीर हादसा हुआ, जब मेले में लगे एक झूले के टूटने से 13 लोग घायल हो गए। इस दुर्घटना में झूला परिसर के सिक्योरिटी इंचार्ज इंस्पेक्टर जगदीश प्रसाद की मौत हो गई, जबकि सात घायलों की हालत गंभीर बताई गई। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यह हादसा शाम करीब सवा छह बजे हुआ, जब झूले पर 19 लोग सवार थे और झूला तेज गति से ऊपर-नीचे झूल रहा था। अचानक एक सिरे से झूला टूट गया, जिससे वह जमीन से दो–तीन फुट ऊपर हवा में लटक गया, जबकि दूसरा सिरा ऊपर ही बना रहा।

हादसे के तुरंत बाद आसपास मौजूद दुकानदारों और पुलिसकर्मियों ने राहत एवं बचाव कार्य शुरू किया। इंस्पेक्टर जगदीश प्रसाद भी झूले पर फँसे लोगों को सुरक्षित उतारने में जुटे थे। कई लोगों को नीचे उतारा जा चुका था और कुछ को उतारा जा रहा था, तभी झूले का दूसरा सिरा भी टूट गया और पूरा ढांचा जमीन पर गिर पड़ा। इस दौरान कई लोग झूले की चपेट में आ गए और इंस्पेक्टर को गंभीर चोटें आईं। घायलों में से नौ लोगों को पास के निजी अस्पताल और चार लोगों को बीके अस्पताल ले जाया गया, जहां निजी अस्पताल में इलाज के दौरान इंस्पेक्टर जगदीश प्रसाद की मौत हो गई।

इस हादसे को हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और पर्यटन मंत्री ने दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद बताया तथा पूरे मामले की जांच के आदेश दिए। हालांकि, यह घटना एक बार फिर इस सवाल को सामने लाती है कि प्रशासन और सरकार आमतौर पर किसी बड़े हादसे के बाद ही सक्रिय क्यों होती है। अक्सर जांच को तकनीकी खराबी या किसी कर्मचारी की लापरवाही तक सीमित कर दिया जाता है और यदि मामला अधिक तूल पकड़ ले तो निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई कर दी जाती है, जबकि उच्च स्तर के जिम्मेदार अधिकारी बच निकलते हैं। इसी कारण हादसों के मूल कारण समाप्त नहीं हो पाते और ऐसी घटनाएँ बार-बार दोहराई जाती हैं।

सूरजकुंड मेले में झूला टूटने की यह घटना भी कहीं न कहीं प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण प्रतीत होती है। मनोरंजन के लिए आए लोगों ने कभी नहीं सोचा होगा कि झूले पर बैठना उनकी जान के लिए खतरा बन सकता है। हादसे के बाद झूला संचालक और एक कर्मचारी की गिरफ्तारी जरूर हुई, लेकिन केवल इतनी कार्रवाई से भविष्य में ऐसे हादसों पर रोक लगेगी, इस पर भरोसा करना कठिन है। असल सवाल यह है कि झूले को चलाने से पहले उसकी सुरक्षा जांच ठीक से हुई थी या नहीं और मेले की अनुमति देते समय सभी झूलों और गतिविधियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी।

पिछले कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग हिस्सों में झूलों, मनोरंजन राइड्स और रोपवे से जुड़े हादसे लगातार सामने आए हैं, जो इस क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर करते हैं। जनवरी 2026 में मध्य प्रदेश के झाबुआ मेले में एक विशाल स्विंग गिरने से लगभग 14 बच्चे घायल हुए, जबकि सितंबर 2025 में गुजरात के पागवाड हिल रोपवे में केबल टूटने से कम से कम छह लोगों की मौत हो गई। इसी तरह अक्टूबर 2025 में महाराष्ट्र के कगल मेले में टॉवर राइड की तकनीकी खराबी से 18 लोग करीब 80 फुट की ऊँचाई पर कई घंटों तक फँसे रहे। मई 2025 में चेन्नई के वीजीपी यूनिवर्सल किंगडम में थ्रिल राइड बीच में रुक गई और लगभग 30 लोग घंटों तक फँसे रहे, जबकि अप्रैल 2025 में साउथ वेस्ट दिल्ली के एक मनोरंजन पार्क में रोलर कोस्टर की सीट बेल्ट फेल होने से 24 वर्षीय महिला की मौत हो गई।

इनके अलावा जुलाई 2023 में नैनीताल रोपवे में तकनीकी गड़बड़ी के कारण 12 यात्री हवा में फँस गए थे और अप्रैल 2022 में त्रिकूट रोपवे, देवघर में दो केबल कारों के टकराने से दो लोगों की मौत हुई थी तथा यात्री कई घंटों तक फँसे रहे। जुलाई 2022 में कोलकाता के रामलीला ग्राउंड में फैरिस व्हील से गिरने पर एक महिला गंभीर रूप से घायल हुई थी, जबकि 2019 में अहमदाबाद और 2024 में तमिलनाडु के थिरुपथुर में थीम पार्क के पेंडुलम राइड हादसों में कई लोगों की जान गई और दर्जनों लोग घायल हुए। अधिकांश मामलों में प्रारंभिक जांच में रखरखाव की कमी, समय पर निरीक्षण न होना, सुरक्षा मानकों की अनदेखी और अनुभवहीन संचालन जैसी वजहें सामने आईं, लेकिन कार्रवाई अक्सर निचले स्तर तक ही सीमित रही।

अब सूरजकुंड हादसे की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया गया है, जो झूले की स्थापना, रखरखाव, निरीक्षण और संचालन से जुड़े लोगों से पूछताछ करेगी। लेकिन कहना ग़लत नहीं होगा कि यह जांच तभी सार्थक सिद्ध होगी, जब तकनीकी प्रमाणपत्रों, सुरक्षा रिपोर्टों और मानकों के पालन की निष्पक्ष व पारदर्शी जांच हो तथा वास्तविक दोषियों पर ईमानदारी से कार्रवाई की जाए। यदि हर हादसे के बाद सरकार केवल औपचारिक कदम उठाती रही और जड़ तक नहीं पहुँची, तो ऐसे हादसे होते रहेंगे। वास्तविक जिम्मेदारों को जवाबदेह बनाना ही भविष्य में ऐसे आयोजनों को सुरक्षित बनाने का एकमात्र रास्ता है।

सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड

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