नरवणे की अनपब्लिश्ड किताब पर FIR: 7 चौंकाने वाले खुलासे

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दिल्ली पुलिस ने सोमवार को पूर्व आर्मी चीफ जनरल एमएम नरवणे की अनपब्लिश्ड किताब Four Stars of Destiny के कथित सर्कुलेशन को लेकर FIR दर्ज की। यह मामला तब और गंभीर हो गया जब कांग्रेस सांसद राहुल गांधी संसद परिसर में इस किताब की कॉपी दिखाते नजर आए।

नरवणे की अनपब्लिश्ड किताब पर FIR: पूरा मामला क्या है

दिल्ली पुलिस के मुताबिक, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और कुछ ऑनलाइन न्यूज फोरम पर ऐसी जानकारी सामने आई थी कि जनरल नरवणे की किताब की प्री-प्रिंट कॉपी सार्वजनिक रूप से सर्कुलेट हो रही है।

जांच में यह भी सामने आया कि इसी टाइटल से जुड़ी एक टाइप-सेट PDF कॉपी कुछ वेबसाइट्स पर उपलब्ध थी। आशंका जताई जा रही है कि यह कॉपी पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा तैयार की गई शुरुआती प्रिंट हो सकती है।

पुलिस ने स्पष्ट किया कि किताब को अभी रक्षा मंत्रालय समेत संबंधित सरकारी विभागों से प्रकाशन की औपचारिक मंजूरी नहीं मिली है। ऐसे में बिना अनुमति इसका सार्वजनिक होना कानूनन अपराध की श्रेणी में आ सकता है।

राहुल गांधी का संसद में किताब दिखाना

नरवणे की अनपब्लिश्ड किताब पर FIR उस समय चर्चा में आई, जब 4 फरवरी को राहुल गांधी संसद परिसर में मीडियाकर्मियों को किताब की कॉपी दिखाते नजर आए।

राहुल गांधी ने दावा किया कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद में मौजूद होते, तो वे उन्हें यह किताब सौंपते। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार किताब के अस्तित्व से इनकार कर रही है, जबकि यह किताब मौजूद है।

राहुल गांधी का आरोप था कि इस किताब में चीन की लद्दाख में घुसपैठ से जुड़े अहम तथ्य दर्ज हैं, जिन्हें संसद में पढ़ने की उन्हें अनुमति नहीं दी गई।

किताब में क्या है? चीन और अग्निवीर योजना का जिक्र

नरवणे की इस अनपब्लिश्ड किताब में वर्ष 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत-चीन के बीच हुए सैन्य तनाव का विस्तृत विवरण है। इसके साथ ही किताब में अग्निवीर योजना की भी समीक्षा की गई है।

कांग्रेस द्वारा साझा किए गए अंशों के अनुसार, 31 अगस्त 2020 की रात को चीनी टैंकों की गतिविधियों और भारतीय सेना की प्रतिक्रिया का मिनट-दर-मिनट विवरण किताब में मौजूद है।

31 अगस्त 2020 की रात: किताब में दर्ज घटनाक्रम

  1. चीनी टैंक भारतीय ठिकानों से कुछ सौ मीटर की दूरी तक पहुंच गए थे।
  2. सेना प्रमुख ने रक्षा मंत्री, NSA और CDS से स्पष्ट निर्देश मांगे।
  3. प्रधानमंत्री से बात के बाद संदेश मिला— “जो उचित समझो, वह करो।”
  4. किताब के अनुसार, अंतिम निर्णय लेने की जिम्मेदारी पूरी तरह सेना प्रमुख पर छोड़ दी गई थी।

नरवणे की अनपब्लिश्ड किताब पर FIR केवल एक कानूनी मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संसदीय परंपराओं से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है।

आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि जांच किस दिशा में जाती है और क्या किताब को प्रकाशन की अनुमति मिलती है या नहीं। इस विवाद का असर राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ सैन्य और प्रशासनिक हलकों में भी लंबे समय तक बना रह सकता है।

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