**फीके पड़ते रंग, टूटते रिश्ते**
फीके पड़ते रंगों की ये कहानी है,
चेहरों पर हँसी, मगर आँखों में पानी है।
कल तक जो अपने थे, आज बेगाने लगते हैं,
रिश्तों के धागे अब क्यों इतने कच्चे लगते हैं?
वक़्त की धूप ने रंगत चुरा ली,
अपनों की बातों ने चुभन भरा दी।
वादों की बारिश थी, भीगी थी हर डाली,
अब सूखी हवाओं में बस यादों की लाली।
दीवारें ऊँची, दिल छोटे हो गए,
साथ चलते-चलते क्यों रस्ते खो गए?
मोबाइल की रोशनी में चेहरे तो चमकते हैं,
पर दिलों के अँधेरे और गहरे भड़कते हैं।
फीके रंगों में ढूँढते हैं पुरानी वो बहार,
जब बिना मतलब के होता था हर इकरार।
न था कोई हिसाब, न थी कोई शर्त,
बस अपनापन ही था रिश्तों की असली मूरत।
अब हर रिश्ता जैसे सौदे में बदल गया,
हर “कैसे हो?” भी मतलब में ढल गया।
विश्वास की नींव जब हिलने लगती है,
हर मुस्कान भी शक सी लगती है।
पर सुनो! अभी सब कुछ खोया नहीं,
रिश्तों का आसमान भी रोया नहीं।
अगर दिल से दिल तक एक सच्ची पुकार हो,
तो फीके रंगों में भी फिर से बहार हो।
चलो फिर से भरोसे की तस्वीर बनाएँ,
टूटे रिश्तों में उम्मीद के रंग सजाएँ।
■ राम प्रसाद माथुर
