आवारा सांडों का आतंक

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आवारा सांडों का आतंक

सांडों का अब सड़क पर, बढ़ता जाता राज। राहगीर सहमे हुए, कौन सुने आवाज॥

बाजारों में घूमते, लेकर भारी देह।

कब किसको रौंद दे, भयभीत हर गेह॥

फसल रौंदते खेत की, सड़कों पर उत्पात।

आवारा पशु कर रहे, जन-जीवन आघात॥

कुंभकर्ण-सी नींद में, सोया आज विधान।

सांडों के आतंक से, संकट में है जान॥

दुर्घटना में जा रही, कितनों की ही जान।

फिर भी जागा क्यों नहीं, शासन जुड़ा विधान॥

बच्चे, बूढ़े, राहियों, सबके मन में त्रास।

कब तक भय से सांड के, सहें लोग वनवास॥

सड़कों पर अधिकार है, सांडों का दिन-रात।

जनता चलने से डरे, कैसी यह सौगात॥

गौशाला के नाम पर, खर्च हुआ धन-धाम।

फिर सड़कों पर क्यों दिखें, सांड यूँ सरेआम॥

रात अँधेरी, बीच पथ, सांड खड़ा विकराल।

पल भर में जो कर सके, जीवन को बदहाल॥

नियम बने अब कागजी, धरती पर उत्पात।

जनता कब तक झेलती, लापरवाही घात॥

देखभाल चारा नहीं, ना आश्रय का ठौर।

सांड भटकते गाँव में, शहरों में हर ओर॥

पशु भी आखिर जीव हैं, उनका भी अधिकार। सुरक्षित जन-जीवन करे, पशुओं का उद्धार॥

समय रहते हम हल करें, शासन और समाज।

वरना संकट बढ़ उठे, बिगड़ेगा हर काज॥

सांडों के आतंक से, सूनी हुई दुकान।

डर के मारे राह में, रुकता हर इंसान॥

घायल होकर गिर पड़े, कितने ही परिवार।

कौन सुनेगा दर्द अब, कौन करेगा उपचार॥

अब तो जागो हुक्मरां, सुन लो जन की आह।

सांडों से सुरक्षित करो, गाँव-शहर की राह॥

– डॉ. सत्यवान सौरभ

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